….. लेकिन देश नहीं बिकने दूंगा !

ओम प्रकाश तिवारी
आज कल भारत में देश भक्ति की खुमारी छाई हुई है। हर कोई देशभक्ति के तराने गा रहा है। चहुंओर भारत माता की जय और वन्देमातरम की अनुगूँज सुनाई पड़ रही है। ग्राम सेवक से लेकर प्रधान सेवक तक गला फाड़-फाड़ कर कह रहे है कि मर जाऊंगा, लेकिन देश नहीं बिकने दूंगा। रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे और नवरत्न कंपनियां भले बिक जाए, एलआईसी बिक जाय, लेकिन देश नहीं बिकने दूंगा। गरीब भूख से मरे तो मरे, बैंक लुटे तो लुटे, चीन घुसे तो घुसे, लेकिन देश नहीं बिकने दूंगा।
महान भारत में देशभक्ति की लहर चल रही है। चाय वाले हों या फिर गाय वाले, सब देशभक्ति की धूनी रमा रहे हैं। सत्ता की जय बोल रहे हैं। इधर कुछ सालों से मेरे मित्र सुजान भी देशभक्ति से संक्रमित हैं। देशभक्ति के आग में सुजान जी की चाय की दूकान लगभग स्वाहा हो चुकी है। ग्राहक धीरे-धीरे मुंह फेरते जा रहे हैं। लेकिन सुजान जी की भक्ति में कमी नहीं आई। कहते हैं कि युगों बाद तो देश को गृह त्यागी और तपस्वी नेतृत्व मिला है। अब भारत को विश्व गुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।
एक दिन सुजान जी अपनी दूकान पर ग्राहकों के लिए चाय बना रहे थे। देशभक्ति पर विमर्श जारी था। सब अपनी-अपनी हांक रहे थे। सुजान जी भी देशभक्ति के नशे में चाय का भगौना भट्टी पर उलझा रहे थे। एकाएक खौलती चाय अपने ही ऊपर उड़ेल लिया। अरे-अरे यह क्या हुआ ? जले तो नहीं ? अरे लावो पोंछ दें। दूध की मलाई लगा लो छाले नहीं पड़ेंगें। अब देश की चर्चा छोड़कर हर कोई सुजान के जले पर अपने-अपने चिकित्सीय ज्ञान का नमक छिड़क रहा था।
सुजान को जले से ज्यादा अपने नुकसान की पीड़ा साल रही थी। कोरोना के चलते वैसे ही ग्राहकों का टोंटा है। जो दूध और चीनी थी वह भी गई देशभक्ति के चक्कर में। एक भगौने में बीस-पच्चीस चाय तो तैयार ही होती। पच्चीस चाय मतलब सवा सौ रूपये। सुजान जी यही सोच ही रहे थे कि मौके पर उनकी श्रीमती जी आ गई। श्रीमती जी को देखते ही सुजान जी के मन-मस्तिष्क से देशभक्ति वैसे ही गायब हो गई जैसे गधे के सर से सींग।
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