राम कवन प्रभु पूछहि तोहि

डा चन्द्रविजय चतुर्वेदी –प्रयागराज
–बाबा तुलसी के मानस में एक प्रसंग है -प्रयागराज गुरुकुल के दस सहस्त्र बटुकों के कुलपति ऋषि भारद्वाज को संशय हुआ की ब्रह्मस्वरूप राम और अवधेशकुमार राम एक ही हैं या दोनों अलग अलग हैं
–एक अवसर पर उन्होंने अपने संशय की अभिव्यक्ति अपने गुरु ऋषि याज्ञवल्क से करते हुए पूछा कि —राम कवन प्रभु पूछहि तोहि —
–समाधान हेतु याज्ञवल्क जी ने वह कथा बताई की सीताहरण के उपरान्त जब राम वियोग में खग मृग से सीता के बारे में पूछ रहे थे तो भगवान शंकर अंतरिक्ष में राम की आराधना कर रहे थे
-सती को संशय हुआ —
–ब्रह्म जो व्यापक बीरज अज अकळ अनीह अभेद
–सोइ कि देह धरि होइ नर जाहिन जानत वेद
अर्थात जो ब्रह्म सर्वव्यापक मायारहित अजन्मा अगोचर इच्छारहित और भेदरहित है –जिसे वेद भी नहीं जानते -क्या वह देहधारण करके मनुष्य हो सकता है
–भगवान शंकर भवानी से कहते रहे की राम ब्रह्म के अवतार हैं –अवतरेउ अपने भगत हित —पर सती का संशय दूर नहीं होता और वे राम की परीक्षा हेतु सीता का वेश धारण करके वन पहुँच ही गई —
–राम ने सती को देखते ही माँ का सम्बोधन करते हुए पूछा –कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू -विपिन अकेलु फिरहि केहि हेतु –
–राम को जानने में जब ऋषि भारद्वाज और सती जैसी विभूतियों को जब हो जाती है तो सामान्य मानव की क्या बिसात ?
–रामकथा प्रारम्भ करने के पूर्व तुलसी अपने नायक की वंदना करते हैं —
बंदउँ रामनाम रघुबर को हेतु कृसानु भानु हिमकर को
विधि हरिहर मय वेदप्रान सो अगुन अनुपम गुन निधान को
—अर्थात मैं श्री रघुनाथ के नाम राम की बंदना करता हूँ जो कृसानु –अग्नि भानु –सूर्य और हिमकर -चन्द्रमा का हेतु है अर्थात र आ म रूप से बीज है –यही रामनाम ब्रह्मा विष्णु और शिवरूप में है –वह वेदों का प्राण है –निर्गुण उपमा रहित –गुणों का भंडार है
—बाबा तुलसी राम के निर्गुण सगुन रूप का वर्णन करते हुए अंत में कहते हैं —-चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोई —
चन्द्र विजय चतुर्वेदी
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–राम कवन प्रभु –का उत्तर समूचे देश की भाषाओँ की रामकथा ढूंढती हैं
—भक्तिमार्गी रैदास कबीर दादू ढूंढते हैं –कबीर बहुत साफ़ कहते हैं —
—सबमे रमै रमावै जोई —ताकर नाम राम अस होइ
–कबीर की दृष्टि में —
चार राम हैं जगत में तीन नाम व्यवहार
चौथ राम जो सार है ताना करो विचार
—-आइये रामनवमी के पावन पर्व पर हम राम का आवाहन करें की वे विश्व को संकट मुक्ति करें





