राजनीति में सत्ता कैसे पाई जाती है चाणक्य ने बताएं हैं दांवपेंच

महाराष्ट्र की सियासी राजनीति में आज एक बड़ा उलटफेर हुआ है। देवेंद्र फडणवीस ने आज सुबह राजभवन में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में दोबारा शपथ ली और एनसीपी के अजित पवार को भी उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। इसके साथ ही शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने का सपना टूट गया। राज्यपाल ने फडणवीस सरकार को 30 नवंबर तक बहुमत साबित करने का समय दिया है।

इस पूरे सियासी खेल के पीछे एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह की तारीफ हो रही है। सियासी शतरंज की चाल में एक बार फिर से अमित शाह विरोधियों को मात देने में कामयाब हुए हैं। इस मौके पर आज हम आपको राजनीति और समाजनीति पर आचार्य चाणक्य के कुछ विचार बता रहें कि कैसे अपने विरोधियों पर जीत हासिल की जा सकती है।

  • हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ जरूर होता है। ऐसी कोई मित्रता नहीं, जिसमें स्वार्थ ना हो। यह कड़वा सच है।
  •  4. अगर सांप जहरीला ना भी हो तो भी उसे खुद को जहरीला दिखाना चाहिए।
  •  5. इस बात को व्यक्त मत होने दीजिए कि आपने क्या करने के लिए सोचा है, बुद्धिमानी से इसे रहस्य बनाएं रखें और इस काम को करने के लिए दृढ़ रहें।
  • जैसे ही भय आपके करीब आए, उस पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दें।8. किसी मूर्ख व्यक्ति के लिए किताबें उतनी ही उपयोगी हैं, जितना कि एक अंधे व्यक्ति के लिए आइना।
  • कोई व्यक्ति अपने कार्यों से महान होता है, अपने जन्म से नहीं।
  • जिस प्रकार सूखे पेड़ को अगर आग लगा दी जाए तो वह पूरा जंगल जला देता है, उसी प्रकार एक पापी पुत्र पूरे परिवार को बर्बाद कर देता है।
  •  पहले पांच सालों में अपने बच्चे को बड़े प्यार से रखें। अगले पांच साल उन्हें डांट-डपट के रखें। जब वह सोलह साल का हो जाए तो उसके साथ एक मित्र की तरह व्यवहार करें। आपके वयस्क बच्चे ही आपके सबसे अच्छे मित्र हैं।
  •  हमें भूत के बारे में पछतावा नहीं करना चाहिए, ना ही भविष्य के बारे में चिंतित होना चाहिए, विवेकवान व्यक्ति हमेशा वर्तमान में जीते हैं।
  •  सांप के फन, मक्खी के मुख और बिच्छू के डंक में ज़हर होता है, पर दुष्ट व्यक्ति तो सिर से पैर तक इसमें भरा होता है।
  •  जब आप किसी काम की शुरुआत करें, तो असफलता से नहीं डरें और उस काम को ना छोड़ें। जो लोग ईमानदारी से काम करते हैं वो सबसे प्रसन्न होते हैं।
  • सेवक को तब परखें जब वह काम ना कर रहा हो, रिश्तेदार को किसी कठिनाई में, मित्र को संकट में और पत्नी को घोर विपत्ति में।
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