यकीनन, एक छोटी सी कोशिश बदल देगी तस्वीर

संगीता ने शिशु को जन्म देने के तुरंत बाद उसे अपने आंचल में भरा और प्यार की एक झप्पी देकर तुरंत शिशु को अपना दूध पिलाया। यह एक छोटी सी पहल थी। जाहिर है इसमें संगीता को न कोई कष्ट हुआ और न ही इसके लिए कोई बड़ी भारी रकम चुकाई गई। सब कुछ स्वाभाविक तरीके से आराम से होता गया। संगीता मां के दूध की कीमत समझती थी।
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लेकिन बड़े ताज्जुब की बात है कि यह एक छोटी सी बात प्रदेश की 85 प्रतिशत महिलाएं या तो नहीं जानती या फिर जानती भी हैं तो समाज में चले आ रहे मिथकों को तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं। इसी का परिणाम यह दिखता है कि विकास के हजारों नारों के बीच हमारे प्रदेश के पचास फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषण के चक्र में फंसे हुए हैं। इस कलंक से मुक्ति पाने का सबसे पहला उपाय यानी पहले घंटे और केवल छह महीने तक मां के दूध का संदेश न तो सरकार और न समाज लोगों तक प्रभावी तरीके से पहुंचा पाया।





