मुस्लिमों में शिक्षा के प्रति बढ़ रही है जागरूकता

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साक्षरता दर 74 फीसदी है लेकिन मुस्लिम समुदाय में साक्षरता दर 60 फीसदी है. अगर 17 साल और उससे ज्यादा उम्र के किशोरों की साक्षरता दर को देखा जाय तो दसवीं तक की पढ़ाई पूरी कर चुके छात्र 26 फीसदी हैं लेकिन मुस्लिम समुदाय में ये महज 16 फीसदी है. ऑल इंडिया सर्वे के मुताबिक उच्च शिक्षा में मुस्लिम छात्रों का औसत 2016-17 में 4.9 फीसदी पाया गया है जो कि उच्च शिक्षा में मुस्लिम समुदाय की असलियत बयां करता है. दरअसल इस कमी के पीछे प्राइमरी और सेंकेंड्री एजुकेशन में मूलभूत साधन का अभाव एक बड़ी वजह बताया गया है.
सरकार के द्वारा किए जा रहे प्रयास को नाकाफी मानते हुए मुस्लिम समाज के एक मौलाना, जो कि ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के मुखिया भी हैं, मुस्लिम युवाओं को शिक्षा से जोड़ने का अनूठा प्रयास कर रहे हैं. मौलाना वली रहमानी ने 2008 में ही रहमानी फाउंडेशन बैनर के तले मेधावी छात्रों को चुनकर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया. रहमानी फाउंडेशन के नाम से शुरू हुई संस्था अब रहमानी आर्ट ऑफ एक्सिलेंस के नाम से विख्यात है.
बिहार के मुंगेर से रहमानी आर्ट ऑफ एक्सिलेंस की शुरुआत की गई थी लेकिन अब देश के कई हिस्सों में इसके सेंटर खुल चुके हैं. ये अब महराष्ट्र के औरंगाबाद, बेंगलुरु, हैदराबाद और पटना में मुस्लिम समाज के बच्चों को उनकी रुचि के मुताबिक क्षेत्र में आगे बढ़ाने का काम कर रहा है. साल 2008 में शुरू किया गया रहमानी फाउंडेशन पिछले दस सालों में कई मुस्लिम बच्चों के भविष्य का निर्माण कर चुका है.
2009 में पहली दफा आईआईटी एडवांस की परीक्षा में 10 बच्चों का चुनाव हो पाया था जो 2015 में बढ़कर 32 हो गया. 2016 और 2017 में इनकी संख्या 50 और 75 हो गई. 2018 में आईआईटी एडवांस में चुने गए बच्चों की संख्या 46 है. रहमानी आर्ट ऑफ एक्सिलेंस के मुताबिक आईआईटी इस साल एक तिहाई सीट कम कर दी थी, इसलिए 2017 के मुकाबले आईआईटी एडवांस में चुने गए बच्चों की संख्या कम हुई.
आईआईटी जेईई मेन्स में भी चुने गए छात्रों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है. इसमें चुने गए बच्चे एनआईटी के तहत आने वाले कॉलेजों में दाखिला ले सकते हैं. साल 2009 से लेकर 2018 का परिणाम काफी उत्साह वर्धक रहा है. साल 2009 में 10 तो साल 2015, 2016, 2017 और 2018 में क्रमश: 56, 95, 120 और 137 बच्चे चुने गए हैं. मेडिकल इंट्रेंस से लेकर कॉमर्स तक की रुचि रखने वालों के लिए यहां सारी सुविधाएं हैं और लड़कों के साथ साथ अब लड़कियों को भी प्रमुख क्षेत्रों में लाभान्वित कर रहा है.
रहमानी फाउंडेशन के नाम से विख्यात इस इंस्टीट्यूय ने कई लड़कों की जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया है. गरीबी इन बच्चों की पढ़ाई के रास्ते में रोड़ा नहीं बन रही है. यह संस्था पहले केवल इंजीनियरिंग के इंट्रेंस के लिए बच्चों को तैयार करती था लेकिन अब कॉमर्स, लॉ और मेडिकल जैसे तमाम क्षेत्रों में मुस्लिम समाज के बच्चों को तैयार करती है.
कैसे हुई रहमानी आर्ट ऑफ एक्सिलेंस की स्थापना
मौलाना वली रहमानी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के प्रमुख सदस्य हैं और बिहार, ओडिशआ और पश्चिम बंगाल के शरियत प्रमुख भी. वली रहमानी बिहार काउंसिल के वाइस चेयरमैन भी रह चुके हैं. रहमानी साहब मुस्लिम समुदाय में आधुनिक शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए सालों से पल रही अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करना चाह रहे थे. इस कड़ी में उनकी मुलाकात बिहार के सुपर कॉप और फिजिक्स के बेहतरीन जानकार अभयानंद को संपर्क किया.
अभयानंद उन दिनों बीएमपी में कार्यरत थे. अभयानंद की पढ़ाने में रुचि और उसका बेहतरीन परिणाम कई बार लोगों को देखने और परखने को मिल चुका था. रहमानी साहब के निवेदन पर अभयानंद ने हां भर दी वो भी इस शर्त पर कि सारा मैनेजमेंट रहमानी साहब संभालें लेकिन एकेडमिक मैनेजमेंट अभयानंद संभालेंगे. बच्चों की ट्रेनिंग के साथ-साथ अभयानंद टीचर को भी नई चुनौती के लिए तैयार करने लगे. आज टीचर का एक समूह अभयानंद की देख-रेख में तैयार हो चुका है जो बच्चों को कामयाब बनाने के तौर तरीकों से पूरी तरह वाकिफ है.
अभयानंद कहते हैं कि पढ़ाने में मेरी दिलचस्पी है और जो भी पढ़ने में रुचि दिखाता है उसे पढ़ाना मुझे पसंद है. आज सैकड़ों मुस्लिम बच्चे आईआईटी से लेकर कई महत्वपूर्ण संस्थानों में पढ़ रहे हैं और उनके जीवन में गुणात्मक परिवर्तन देखकर मुझे खुशी होती है.
अभयानंद कहते हैं कि मुस्लिम समाज में पढ़ाई की भूख जग चुकी है. समाज को लगने लगा है कि आगे बढ़ने के लिए पढ़ना जरूरी है. इसलिए बच्चों को आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान कर रहे हैं जो काबिलेतारीफ है.
टैलेंट को तराश कर संवार रहा है जीवन
एक समय जब इस बात की चर्चा आम थी कि किस तरह आतंकी संगठन होनहार मुस्लिम बच्चों को आतंक की आग में झोंककर उन्हें खूंखार आतंकवादी बना देते हैं. मौलाना रहमानी उन दिनों अभयानंद के साथ जगह-जगह घूम कर मुस्लिम बच्चों की सेलेक्शन प्रक्रिया में जुटे थे. इसके कर्ता धर्ता वली रहमानी ने तय किया कि मुंबई चलकर भी मुस्लिम समुदाय के बच्चों का चयन किया जाए और इसके लिए लिखित परीक्षा लेकर मेधावी छात्रों का चुनाव किया गया, जिन्हें नि:शुल्क शिक्षा दिए जाने के लिए चयन किया जाना था.
इस क्रम में उनकी मुलाकात याजिद पाशमा से हुई जो औरंगाबाद का रहने वाला था और पिता के साथ अंडे बेचने में सहयोग किया करता था. याजिद 2010-11 में आईआईटी खड़गपुर के लिए चुना गया और इस वक्त एक मल्टीनेशनल कंपनी में बिजनेस एनालिस्ट के तौर पर काम कर रहा है. ऐसे कई बच्चे हैं जो याजिद की तरह रहमानी आर्ट ऑफ एक्सिलेंस में पढ़कर अपनी जिंदगी संवार चुके हैं. ऐसी कहानी सिर्फ एक नहीं बल्कि हर बच्चे की कहानी है जो अपने आप में दिलचस्प है. आईआईटी दिल्ली में अता उल हक हों या फिर सैफ अली, इन सबकी कहानी याजिद से मिलती जुलती है.
साल 2008 से लेकर अब तक कुल 259 मुस्लिम बच्चों का चयन आईआईटी कॉलेज में हो चुका है वहीं 513 बच्चे एनआईटी सरीखे कॉलेज में दाखिला पा चुके हैं. रहमानी फाउंडेशन में दाखिले की प्रक्रिया बेहद सरल है. यहां टॉप 30 बच्चों को रहने-खाने से लेकर पढ़ाई तक की सुविधा मुफ्त है. उसके बाद की रैंकिंग बालों को खाने और रहने की फीस देनी पड़ती है लेकिन कोचिंग की फीस उनसे भी नहीं ली जाती है. दरअसल हर साल रहमानी फाउंडेशन एक परीक्षा के जरिए अपनी क्षमता के हिसाब से बच्चों का सेलेक्शन करता है उसमें से टॉप के 30 बच्चों के लिए रहने खाने से लेकर पढ़ने तक की सारी सुविधा मुफ्त मुहैया कराई जाती है.
जैसा नाम, वैसा काम
रहमानी फाउंडेशन का पटना सेंटर जो अनीशाबाद में खुला है, वहां बच्चे दिन रात कड़ी मेहनत करते देखे जा सकते हैं. यहां स्वध्याय का बेहतरीन माहौल नजर आता है, जहां बच्चों में एक-दूसरे के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा देखा जा सकती है. बड़े हॉल में बच्चे एक दूसरे के साथ फिजिक्स, मैथ्स और केमिस्ट्री के सवाल का जवाब ढूंढते नजर आते हैं.
छात्र अब्दुर रहमान कहते हैं कि उनके मामा रहमानी 30 से आईएसएम धनबाद में चुने गए थे. उनके चुनाव के बाद उन्होंने सोच लिया था कि पहले रहमानी 30 की परीक्षा पास कर बेहतर तैयारी के लिए पटना रुखसत होंगे.
दरअसल अब्दुर रहमान के पिता एक प्राइवेट कंपनी में साधारण मुलाजिम हैं इसलिए अब्दुर रहमान के लिए कोचिंग के पैसे जुटाना आसान नहीं था. लेकिन रहमानी में उनका चुनाव उनके आईआईटी तक का सफर आसान कर देगा ऐसा उन्हें पूरा विश्वास है.
वहीं अम्मार शेख मुंबई से पटना पढ़ने आए हैं. वो आईआईटी करना चाहते हैं क्योंकि रहमानी 30 में सेलेक्ट होने के बाद उन्हें अपनी काबिलियत पर भरोसा बढ़ गया है. अम्मार शेख कहते हैं कि पापा मेरे डॉक्टर हैं लेकिन उन्हें इंजीनियर बनने का मन है. इसलिए रहमानी फाउंडेशन में दाखिला लेकर उनका हौसला बढ़ा है.
आईआईटी गौहाटी से पास कर चुके संदीप झा कहते हैं कि छात्रों के चुनाव से लेकर पठन-पाठन तक की प्रक्रिया पटना सेंटर के 10 मुख्य शिक्षकों के द्वारा की जाती है. संदीप झा कहते हैं कि ऐसे शिक्षक के समूह को तैयार करने में अभयानंद जी की भूमिका अहम है. पढ़ने और पढ़ाने के पूरे तौर तरीकों को उन्होंने इस कदर सिखा दिया है कि दिन प्रतिदिन रिजल्ट बेहतर हो रहा है.
जाहिर है दिन-प्रतिदिन मिल रही सफलता और संस्थान की बढ़ रही संख्या से साफ है कि इस संस्था की भागीदारी मुस्लिम समुदाय को शिक्षा के क्षेत्र में आगे लाने में अहम भूमिका अदा कर रही है. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुस्लिम समुदाय की जिस सबसे बड़ी कमजोरी की तरफ इशारा किया गया था, उसे दूर करने के लिए ये संस्था भरसक प्रयास कर रही है.





