मास्क साबुन मेरे हमसफ़र हो गए

राजेश प्रतापगढ़ी
दोस्तों आजकल पक के तर हो गए,
गैस चूल्हे के जैसे रबर हो गए ।
लॉक डाउन दोबारा बढ़ा जब इधर,
तब से मेरे पिताजी उधर हो गए ।
लोग कहते थे कलमी पपीता मुझे,
अब चुचुक करके सुखी मटर हो गए।
कोई सुनता नही देखता भी नही,
जैसे चैनल की फ़र्जी ख़बर हो गए।
रिश्ते नातों से बेहतर सेनिटाइजर,
मास्क साबुन मेरे हमसफ़र हो गए ।
रोते रोते हुए हाँथ धोते रहे,
भाग्य प्रतिशत में जो थे शिफर हो गए।
क्या ये कम है अभी अपने घर में है हम,
कितने पत्नीव्रता घर बदर हो गए ।
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