भोपाल गैस कांड : इस परिवार को छू भी न सकी मौत, वजह के बारे में आप सोच भी नहीं सकते

अब से ठीक 34 साल पहले 2-3 दिसंबर 1984 की मध्यरात को भोपाल का जय प्रकाश नगर जिसे जेपी नगर के नाम से भी जाना जाता है, वहां उस रात को सोए कई लोग सुबह नींद से उठ ही नहीं सके। लेकिन इस भीषण त्रासदी में एक परिवार ऐसा भी था जिसे मौत की काली हवा छू भी न सकी।भोपाल गैस कांड : इस परिवार को छू भी न सकी मौत, वजह के बारे में आप सोच भी नहीं सकते

भोपाल गैस कांड में एक परिवार ऐसा भी था, जो इस घटना को अपनी आंखों से तो देख रहा था पर मौत उनके आस-पास भी न भटक सकी। यह परिवार था ‘एसएल कुशवाह’ का, वह पेशे से शिक्षक थे। उस समय उनकी उम्र 45 साल थी, उनकी पत्नी त्रिवेणी भी वहीं मौजूद थीं, जिनकी उम्र 36 साल थी।

जब भोपाल में गैस रिसाव हुआ तो देखते ही देखते न जाने कितने लोग उल्टी, सांस लेने में तकलीफ, खांसी और आंखों में जलन की समस्या से मौत के मुंह में समाते चले गए। चारों ओर मौत का तांडव हो रहा था। चीखती-चिल्लाती आवाजों के बीच कुशवाह दंपति धुंधले, डरे- सहमे चेहरों को साफ देख रहे थे। लेकिन, इस कठिन समय में भी यह परिवार घबराया नहीं, क्योंकि इनके यहां रोज ‘अग्निहोत्र हवन’ होता था। उस दिन भी हुआ था। रात में भी उन्होंने अग्निहोत्र हवन, त्र्यंबकम होम के साथ जारी रखा। इस तरह लगभग 20 मिनट के अंदर ही उनका घर और उसके आस-पास का वातावरण ‘मिथाइल आइसो साइनाइड गैस’ से मुक्त हो गया।

आपको बता दें कि हजारों साल पहले केरल के नंबूदरी ब्राह्मण अग्निहोत्र यज्ञ नाम का हवन करते थे। आज भी वहां पूरी वैदिक रीति से ‘अग्निहोत्र यज्ञ’ किया जाता है। इसके अलावा भारत में कई मंदिरों और घरों में नियमित रूप से ‘अग्निहोत्र यज्ञ’ किया जाता है। अग्निहोत्र के जरिए सूर्य और चंद्रमा से प्राप्त होने वाली उच्च शक्तियुक्त ब्रह्मांड ऊर्जा को बेहतर तरीके से ग्रहण किया जा सकता है। हमारे आसपास की हवा को पवित्र करने के लिए नियमित रूप से अग्निहोत्र हवन करने की परंपरा हिंदू धर्म में बहुत पुरानी है।

अग्निहोत्र हवन करते समय विशेषकर इस बात का ध्यान रखना होता है कि इस हवन को ठीक उसी समय पर किया जाना चाहिए। अग्निहोत्र यज्ञ को सूरज ढलते और सूरज के उगते ही शुरू किया जाता है और दोनों ही समय अग्नि को जौ अर्पित करने होते हैं। सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय गाय के घी की कुछ बूंदों से सने दो चुटकी कच्चे चावल (अक्षत) अग्नि में डाले जाते हैं। इसमें हवन के लिए तांबे के एक अर्ध पिरामिड आकार के पात्र में अग्नि प्रज्वलित की जाती है, जिसमें गाय के गोबर से बने कंडों का ही इस्तेमाल किया जाता है। इस यज्ञ से बनाई गई विभूति इंसान और वातावरण दोनों को ही रोग मुक्त बनाती है। समय का ध्यान रखने के लिए पंचाग का सहारा लिया जा सकता है।

अग्नि में दो बार आहुति डालते समय, दो सरल वेद मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। अग्निहोत्र हवन के दौरान सूर्योदय के समय ‘सूर्याय स्वाहा सूर्याय इदम् न मम, प्रजापतये स्वाहा प्रजापतये इदम् न मम’ मंत्र बोला जाता है। अग्निहोत्र हवन के दौरान सूर्यास्त के समय ‘अग्नये स्वाहा अग्नये इदम् न मम, प्रजापतये स्वाहा प्रजापतये इदम् न मम’ मंत्र बोला जाता है।

‘अग्निहोत्र यज्ञ’ के बारे में यजुर्वेद में विस्तार से बताया गया है। अग्निहोत्र एक नित्य वैदिक यज्ञ है। अग्निहोत्र हवन के लिए अखंडित चावल, गाय का घी, अर्ध पिरामिड के आकार का ताम्रपात्र, गाय के गोबर के उपले की आवश्यकता होती है। अग्निहोत्र के संबंध में अब तक कई शोध भी हो चुके हैं। अग्निहोत्र वैदिक संस्कृति में यज्ञ विधान का मूल तत्व है।

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