बिहार: नाले से आ रहा पीने का पानी, लोगों की सेहत पर मंडरा रहा खतरा

मुजफ्फरपुर में बदहाल जलापूर्ति व्यवस्था के कारण लोग नाले के भीतर से गुजर रही पाइपलाइन का पानी पीने को मजबूर हैं। चार दशक पुरानी लाइनों, लगातार लीकेज और अस्थायी मरम्मत ने स्मार्ट सिटी के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुजफ्फरपुर में जलापूर्ति व्यवस्था की गंभीर लापरवाही एक बार फिर सामने आई है। शहर के कई इलाकों में लोग नाले के पास से गुजर रही पाइपलाइन के जरिए आने वाला पानी पीने को मजबूर हैं। हालात ऐसे हैं कि कहीं नाला पानी में बहता दिख रहा है तो कहीं नाले के भीतर बिछी पाइपलाइन से ही पीने का पानी सप्लाई किया जा रहा है। स्मार्ट सिटी मुजफ्फरपुर की इस तस्वीर ने नगर निगम और प्रशासनिक दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हर दिन 15 से 20 स्थानों पर लीकेज की शिकायतें आती हैं
दरअसल, मुजफ्फरपुर शहर के कई घनी आबादी वाले वार्डों में आज भी चार दशक पुरानी पाइपलाइनों के सहारे जलापूर्ति की जा रही है। नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार, शहर में प्रतिदिन औसतन 15 से 20 स्थानों पर पाइपलाइन लीकेज की शिकायतें सामने आती हैं। इसके बावजूद स्थायी समाधान निकालने के बजाय केवल अस्थायी मरम्मत कर मामले को टाल दिया जाता है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब कई इलाकों में पीने के पानी की पाइपलाइनें सीधे नाले और नालियों के भीतर से होकर गुजर रही हैं। बनारस बैंक चौक के समीप इसका ताजा उदाहरण देखने को मिलता है, जहां नाले के अंदर से पाइपलाइन बिछाई गई है और उसी से नल-जल योजना के तहत नल भी लगा दिया गया है। यहां लोग बदबूदार नाले के बीच बाल्टी डालकर पीने का पानी भरने को मजबूर हैं।
सीवेज का गंदा पानी पाइपलाइन में मिलने की आशंका
स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे हालात में सीवेज का गंदा पानी पाइपलाइन में मिलने की आशंका बनी रहती है, जिससे जलजनित बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। बावजूद इसके, पाइपलाइन बदलने या नई सुरक्षित लाइन बिछाने की कोई ठोस योजना जमीन पर उतरती नजर नहीं आ रही है।
इलाके के लोगों में इस स्थिति को लेकर भारी नाराजगी है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि मजबूरी में वे पानी घर ले जाकर पहले उबालते हैं, ताकि बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों को बीमारियों से बचाया जा सके। लोगों का आरोप है कि नगर निगम सिर्फ मरम्मत के दावे करता है, जबकि जमीनी हकीकत बदहाल जलापूर्ति व्यवस्था की पोल खोल रही है। यह मामला न केवल नगर निगम की कार्यशैली पर सवाल उठाता है, बल्कि स्मार्ट सिटी के दावों को भी कठघरे में खड़ा करता है।





