पेड़ हमारी संस्कृति, आस्था से जुड़े हैं और आस्था से ही पर्यावरण संरक्षण को भी मिलता है बढ़ावा

पेड़ हमारी संस्कृति, आस्था से जुड़े हैं और आस्था से ही पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। आस्था और संस्कृति के चलते लोग कई किस्म के पेड़ों को काटते नहीं बल्कि पीपल, बरगद, शीशम, बेर, बेलपत्र, अजरुन शाल, जियोपोता, अशोक आदि भारतीय पेड़ों की पूजा भी करते हैं। इससे हरियाली तो बनी रहती है, साथ ही पर्यावरण को नुकसान नहीं होता है। इसी को अपना लक्ष्य बनाकर राजपुरा, सरवाल की संवेदना शर्मा जागरूकता मुहिम चला रही हैं।

संवेदना लोगों को भारतीय पेड़ों को अपने घर आंगन में लगाने को प्रेरित कर रही हैं। साथ ही साथ प्लास्टिक के कप, प्लेट के स्थान पर पौधों के पत्तों से बने पत्तल, डूने समारोह में प्रयोग करने के लिए कह रही हैं। इस पूरे काम को अंजाम देने के लिए संवदेना कुछ गैर सरकारी संस्थाओं से भी जुड़ी हैं और अब तक 50 से अधिक जागृति कार्यक्रम, जागृति शिविर, जागृति भ्रमण कार्यक्रमों का हिस्सा बन चुकी हैं। संवेदना शर्मा जम्मू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं।

होटल, ढाबों में भी इस्तेमाल हों पत्तल व दोना

संवेदना कहती हैं कि हम अपनी ही पर्यावरण प्रेमी परंपराओं को भूल रहे हैं। विवाह और दूसरे समारोह में पहले लोग पेड़ के पत्तों के बनी पत्तल व दोना इस्तेमाल करते थे। मगर आज इसकी जगह प्लास्टिक के कप-प्लेट ने ले ली। इसका सबसे बड़ा नुकसान हमारी भूमि और पर्यावरण को हो रहा है। शहरों और गांवों में नदी-नालों के किनारे सब थर्माकोल के कप-प्लेट से भरे पड़े हैं। हमें फिर से अपनी पुरानी पंरपरा से जुडऩा होगा। पलाश के पत्तों से बनी पत्तल या दोना से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं। यह नष्ट हो जाते हैं, मगर प्लास्टिक तो वर्षो तक सड़ता भी नहीं। मैं तो कहती हूं कि होटल, ढाबों पर भी पत्तल व दोना का इस्तेमाल होना चाहिए। आज हमें लोगों को समझाना होगा कि भारतीय पेड़ लगाओ और पुरानी पंरपरा से जुड़कर पर्यावरण के प्रहरी बने।

स्कूली बच्चों को अभियान में करेंगी शामिल

संवेदना ने पिछले दिनों पहाड़ी क्षेत्रों में पहुंचकर प्लास्टिक के कप-प्लेट एकत्र करने का अभियान शुरू किया। इसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। अब वह स्कूलों में स्कूली बच्चों को जागृत करने के लिए अभियान चलाने की तैयारी में है। उनका कहना है कि स्कूली बच्चों को परंपरा से जोड़ा जाएगा तो वह भी पेड़ों के संरक्षक बन जायेंगे। संवेदना शर्मा अपनी लेखनी के जरिए भी लोगों को जागरूक कर रही हैं।

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