पर्यटकों को किले दिखाते खुद का महल बनाने की चढ़ी सनक, दस बरस की मेहनत में खड़ा कर लिया…

जोधपुर। विदेशी पर्यटकों को देश की समृद्ध विरासत दिखाते-दिखाते सूर्यनगरी के एक गाइड को अपना खुद का एक महल बनाने की ऐसी सनक चढ़ी कि वह उसे पूरा कर ही माना। दिल्ली के लाल किले में दीवान ए आम और दीवान ए खास को देख सुरेन्द्र सिंह खिंची को लगा कि ऐसा एक स्थान मेरे पास भी होना चाहिये जहां आकर विदेशी मेहमान बैठ ग्रामीण परिवेश का आनंद उठा सके। खोज शुरू हुई तोड़ी जा रही पुरानी हवेलियों के पत्थरों को खरीदने से। बरसों से जारी जमा पूंजी लगाने के बाद अब इस गाइड ने अपने सपनों का महल आखिरकार खड़ा कर ही लिया। 

ऐसे हुई शुरुआत…
– तीस साल से गाइड का काम कर रहे शहर के खिंची विदेशी पर्यटकों को देश की हेरिटेज संपदा दिखाने का काम करते है। देश के कई हिस्सों में घूमते हुए पर्यटकों को किले-हवेलियां दिखाते हुए बरसों पूर्व उनके मन में विचार आया कि क्यो न खुद का ही एक महल बना लिया जाए जहां आकर पर्यटक सुकून के साथ कुछ समय गुजार सके। साथ ही पर्यटकों को ग्रामीण परिवेश और स्थानीय भोजन उपलब्ध कराया जा सके।
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आसान नहीं थी राह
– खिंची ने महल बनाने का सपना तो देख लिया, लेकिन यह सनक पूरा करना बेहद मुश्किल और खर्चीला काम था। शहर के निकट उन्होंने बरसों पूर्व शहर के निकट आंगणवा रोड पर कुछ जमीन खरीदी थी। उन्होंने योजना तैयार की और जुट गए पुराने पत्थरों की तलाश में। वे ऐसी प्राचीन हवेलियों पर नजर रखने लगे जिन्हें तोड़ा जा रहा हो। इसके बाद वे इन हवेलियों के पुराने पत्थरों को खरीदने लगे।
– कुछ प्राचीन पत्थर कौड़ियों के दाम मिल गए तो कई पत्थरों के बहुत अधिक दाम चुकाने पड़े। सनक पूरी करने में खिंची की जमा पूंजी समाप्त होने लगी। घरवालों ने भी समझाया कि महल बनाने का ख्वाब छोड़ दो, लेकिन वे डटे रहे।
– नौ साल तक भटकने के पश्चात उनकी खोज काफी हद तक पूरी हुई। ये दीगर बात है कि पत्थरों को एकत्र करने में जमा पूंजी के साथ दो बीघा जमीन भी बिक गई। हर समय पत्थरों की तलाश की सनक के कारण रिश्तेदारों तक ने कन्नी काटना शुरू कर दिया।
– अपने सपनों के महल का गेट भी बरसों की मेहनत के बाद मिला। एक हवेली का ढाई सौ साल पुराना गेट वे ले आए। क्षतिग्रस्त हो चुके इस गेट को उन्होंने उसी अंदाज में फिर से तैयार करवा लिया।
– उनके शब्दों में मैने अपनी सनक पूरी करने के फेर में काफी कुछ गंवाया भी है, लेकिन इसे आकार लेता देख मिलने वाला सुख उससे कहीं अधिक मिलता है।
– कुछ प्राचीन पत्थर कौड़ियों के दाम मिल गए तो कई पत्थरों के बहुत अधिक दाम चुकाने पड़े। सनक पूरी करने में खिंची की जमा पूंजी समाप्त होने लगी। घरवालों ने भी समझाया कि महल बनाने का ख्वाब छोड़ दो, लेकिन वे डटे रहे।
– नौ साल तक भटकने के पश्चात उनकी खोज काफी हद तक पूरी हुई। ये दीगर बात है कि पत्थरों को एकत्र करने में जमा पूंजी के साथ दो बीघा जमीन भी बिक गई। हर समय पत्थरों की तलाश की सनक के कारण रिश्तेदारों तक ने कन्नी काटना शुरू कर दिया।
– अपने सपनों के महल का गेट भी बरसों की मेहनत के बाद मिला। एक हवेली का ढाई सौ साल पुराना गेट वे ले आए। क्षतिग्रस्त हो चुके इस गेट को उन्होंने उसी अंदाज में फिर से तैयार करवा लिया।
– उनके शब्दों में मैने अपनी सनक पूरी करने के फेर में काफी कुछ गंवाया भी है, लेकिन इसे आकार लेता देख मिलने वाला सुख उससे कहीं अधिक मिलता है।
अब आगे क्या
– खिंची के अनुसार अभी महल पूरा हुआ नहीं है, लेकिन काफी हद तक आकार ले चुका है। उनकी इच्छा है कि यह पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो। ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित इस दीवाने आम में वे आकर बैठे और लोक संगीत की स्वर लहरियों के साथ ठेठ मारवाड़ी ग्रामीण भोजन का लुत्फ उठाते हुए हमारी समृद्ध विरासत को महसूस करे।





