देश-विदेश में शेफ हैं इस गांव के 5वीं-10वीं पढ़े लोग, पाते हैं लाखों का पैकेज

आकोला(उदयपुर). चित्तौड़गढ़ जिले का करजाली गांव इंडियन फूड को दुनियाभर में मशहूर करने में भूमिका निभा रहा है। इस गांव के करीब 400 लोग देश-दुनिया के होटलों और बड़े लोगो के यहां कुक हैं। दिलचस्प यह है कि ये पांचवी, आठवीं या दसवीं पढ़े हैं, लेकिन 80 हजार रुपए तक की सैलरी पा रहे हैं। जापान में पीएम नरेंद्र मोदी भी हुए थे इनके स्वाद के मुरीद…

– पिछले साल नवंबर में पीएम नरेंद्र मोदी अपनी जापान यात्रा के दौरान यहीं एक कुक के हाथों बने खाने के स्वाद के मुरीद हुए थे। तब उनके लिए इंडियन फूड की जिम्मेदारी करजाली के मांगीलाल मेनारिया को मिली थी। उनके हाथ का राजस्थानी भोजन लेकर पीएम मोदी ने खूब तारीफ की। मांगीलाल टोक्यो की एक होटल में शैफ हैं।
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– फिलहाल यहां के कुक मुंबई जैसे देश के कई प्रमुख शहरों के अलावा अबूधाबी, हांगकांग, जापान, कनाडा, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे कई देशों में काम कर रहे हैं। सबसे ज्यादा दुबई में हैं।
– गांव के गणपतलाल मेनारिया बताते हैं कि यह सिलसिला 1945 में शुरू हुआ था। जब एक व्यक्ति रोजगार की तलाश में मुबंई गए थे।
– गोपाल मेनारिया वहां एक होटल में कुकिंग का काम करने लगे। इसके बाद कुकिंग इस गांव की पहचान बन गई। फिलहाल दुनियाभर में फैले यहां के कुक ज्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं हैं। वैसे तो कई समाजाें के लोग कुकिंग के काम में हैं, लेकिन ज्यादातर मेनारिया ही हैं।
कोई है पांचवी तो कोई दसवीं, सैलरी 50 से 80 हजार
– राधेश्याम मेनारिया 10वीं तक पढ़े हैं। वे हांगकांग में 50 हजार की सैलरी पर काम कर रहे हैं। इसी तरह पुरुषोत्तम मेनारिया केन्या में 60 हजार की नौकरी कर रहे हैं और 5वीं पास हैं।
– जगदीश मेनारिया न्यूजीलैंड में हैं, जो 10वीं पास हैं और सैलेरी 60 हजार है। इसी तरह मदनलाल जाट केन्या में 60 हजार पा रहे हैं और 5वीं पास हैं।
– शंकरलाल तेली, भंवरलाल, मांगीलाल मेनारिया जापान में हैं, जो 70 से 80 हजार रुपए ले रहे हैं। ये पांचवीं-छठवीं तक पढ़े हैं।
72 साल पहले हुई थी इसकी शुरुआत
– गांववाले बताते हैं कि सबसे पहले 1945 में मुंबई जाकर कुकिंग करने वाले स्व. गोपाल मेनारिया ने तब शौक से वहां की मशहूर चौपाटी पर बरगद का पौधा भी लगाया था।
– गोपाल रोजगार की तलाश करते गांव के दूसरे लोगों को भी कुकिंग कार्य के लिए वहां बुलाते रहे। यह संयोग है कि वहां के उस वटवृक्ष की तरह ही यहां कुंकिंग का क्रेज भी इतना बढ़ा कि आज गांव के 400 से अधिक लोग बड़े शहरों में यह काम करते हुए अच्छा खासा पैसा कमा रहे हैं।





