डॉल्फिन की उछलकूद से बढ़ी गेरुआ नदी की रौनक

लेखक : अतुल अवस्थी/मो. उवैसबहराइच/कतर्नियाघाट। डॉल्फिन का नाम आते ही रोमांचक तस्वीर आंखों के सामने घूमने लगती है। वैसे तो डॉल्फिन का प्रवास स्थल गंगा माना जाता है लेकिन कतर्नियाघाट की गेरुआ नदी भी डॉल्फिन से समृद्ध है। वर्षा का क्रम थमने के साथ ही कतर्नियाघाट की गेरुआ नदी में डॉल्फिन की रोमांचक उछलकूद भी बढ़ गई है। बोटिंग करते समय बोट के सामने ही डॉल्फिन की कलाबाजी देखकर मन रोमांचित हो उठता है।
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र 551 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इस सेंचुरी क्षेत्र में नेपाल की गेरुआ और कौड़ियाला नदियां भी बहती हैं। लेकिन सिर्फ गेरुआ नदी में गैंगेटिक डॉल्फिन का प्रवास है। दशक भर पहले गेरुआ नदी में इक्का-दुक्का डॉल्फिन दिखाई पड़ती थीं लेकिन समय के साथ सुरक्षा संरक्षा में इजाफा हुआ। जिसका नतीजा है कि इस समय गेरुआ नदी डॉल्फिन से समृद्ध है। गेरुआ नदी में मगरमच्छ और घड़ियालों की संख्या भी अधिक पाई जाती है।
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गेरुआ के टापू पर जगह-जगह मगरमच्छ और घड़ियालों ने अपना ठिकाना बना रखा है। इसी के साथ गैंगेटिक डॉल्फिन गेरुआ की सुंदरता और स्वच्छता का प्रतीक है। डॉल्फिन की मौजूदगी का मतलब नदी का पूरी तरह स्वच्छ होना माना जाता है। मानसून में पहाड़ों पर हो रही भारी बारिश के चलते जब गेरुआ नदी उफान पर होती है तब डॉल्फिन अक्सर घाघरा की ओर चली जाती है लेकिन नदी सामान्य होते ही इनका ठिकाना गेरुआ नदी की ओर हो जाता है। इन दिनों गेरुआ नदी के एक छोर पर अधिक पानी है तो दूसरे छोर पर पानी की कमी है नदी भी धीरे-धीरे साफ हो रही है। पानी में बहाव भी कम है ऐसे में डॉल्फिन की उछलकूद काफी बढ़ गई है।
काफी शर्मीली होती है डॉल्फिन
उप प्रभागीय वनाधिकारी यशवंत सिंह ने बताया कि गैंगेटिक डॉल्फिन का वैज्ञानिक नाम प्लैटनिष्टा गंगेटिका है। यह जीव काफी शर्मीला होता है। डॉल्फिन के शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध है।
यहां देखी जा सकती है उछलकूद
वन क्षेत्राधिकारी पियूष मोहन श्रीवास्तव ने बताया कि गेरुआ नदी में कतर्नियाघाट के उत्तरी छोर पर पानी काफी मात्रा में है जहां डॉल्फिन की उछलकूद देखी जा रही है।
इस समय हँ 25 डॉल्फिन
उप प्रभागीय वनाधिकारी यशवंत ने बताया कि कतर्नियाघाट के गेरुआ नदी में डॉल्फिन की संख्या इस समय करीब 25 के आसपास है। बारिश के मौसम में इसका इस्टिमेशन किया जाता है।
इन नदियों में होता है प्रवास
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजना अधिकारी दबीर हसन ने बताया कि गैंगेटिक डॉल्फिन से कतर्नियाघाट की गेरुआ नदी तो समृद्ध है ही, गेरुआ नदी के अलावा गंगा, चम्बल, घाघरा, गण्डक, सोन, कोसी, ब्रह्मपुत्र नदियों में भी डॉल्फिन का प्रवास होता है।
गैंगेटिक डॉल्फिन
गंगा की गाय कही जाने वाली डॉल्फिन का वैज्ञानिक नाम प्लेटैनिस्टा गैंगेटिका है। सामान्य तौर पर इसे गैंगेटिक डॉल्फिन या गांगेय डॉल्फिन कहते हैं। क्योंकि सांस लेने के लिए सतह पर आते समय यह तेज आवाज करती है इसलिए इसे सूंस, सोंस या हीहू भी कहा जाता है। कुछ इलाकों में इसे मीठे पानी का बाघ भी कहा जाता है। गंगा के तटीय गांवों में कुछ जगहों पर इसे जलपरी से भी जोड़ा जाता है तो कहीं इसे पानी की नर्तकी माना जाता है। बिहार के सारण क्षेत्र में तो बाकायदा इसकी पूजा भी होती है।
गांगेय डॉल्फिन ढाई से तीन मीटर लम्बी और 150 किलो से ज्यादा वजनदार होती है। इसकी लम्बी पूंछ पर मौजूद फिन शिकार पकड़ने और तैरने में जबकि घडि़यालनुमा लम्बा थूथन शिकार निगलने में इसकी मदद करता है। इसके पास आंखें नहीं होती और यह ध्वनि तरंगों के जरिए देखने और सुनने का काम करती है। डॉल्फिन की औसत उम्र 28 वर्ष होती है और दस वर्ष की उम्र के बाद यह प्रजनन के योग्य हो जाती हैं। गांगेय डॉल्फिन बहुत शर्मीला प्राणी है। इसे सांस लेने के लिए हर आधे मिनट से दो मिनट तक के अंतराल में पानी की सतह पर आना होता है और अनेक बार यह सतह पर आते समय ऐसी करवटें लेती है कि नृत्य का सा आभास होता है।
लेकिन यह सतह पर बहुत ही कम समय के लिए आती है इसलिए इसकी तस्वीरें खींचना भी बहुत मुश्किल होता है। इसकी हलचलें देखना ब्रिटिशकाल में अंग्रेज अधिकारियों का एक प्रिय खेल होता था। यह डॉल्फिन गंगा के अलावा चम्बल, गण्डक, घाघरा, सोन, यमुना, कोसी और ब्रह्मपुत्र, तीस्ता, मानस, दिबांग, लोहित आदि नदियों में पाई जाती है। नेपाल में यह करनाली, सांगू जैसी नदियों में दिखती है। कभी-कभी यह बांग्लादेश में भी दिख जाती है।
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