जानिए कैसे एक राक्षस बना गणपति का वाहन

गणेश पुराण के अनुसार प्रत्येक युग में गणेश जी का वाहन बदलता रहता है। सतयुग में गणेश जी का वाहन सिंह है। त्रेता युग में गणेश जी का वाहन मयूर है और वर्तमान युग यानी कलियुग में उनका वाहन घोड़ा है। गणेश जी का वाहन मूषक कैसे बना, इस संदर्भ में बहुत सारी कथाएं हैं। एक कथा में बताया गया है की गजमुखासुर नाम के राक्षस का गणपति जी से युद्ध हुआ। गजमुखासुर ने तप के बल पर यह वरदान प्राप्त कर रखा था की वो किसी भी अस्त्र-शस्त्र से मारा नहीं जाएगा। जब युद्ध काफी दिनों तक चलता रहा तो गजानन ने अपना एक दांत तोड़ कर गजमुखासुर पर वार किया। गजमुखासुर ने अपनी मृत्यु को पास आता देख मूषक का रूप धारण किया और अपनी जान बचाकर भागने लगा। गणेश जी ने उसे अपने पाश में बांध लिया। गजमुखासुर गणेश जी की शरण में गया। बप्पा ने उसे न केवल क्षमा किया बल्कि जीवनदान भी दिया।जानिए कैसे एक राक्षस बना गणपति का वाहन

द्वापर युग के समय की घटना है महर्षि पराशर अपने आश्रम में ध्यान मग्न थे। तभी कहीं से बहुत ही शक्तिशाली मूषक आया और महर्षि पराशर के ध्यान में विध्न डालने लगा और उनके आश्रम में रखे अनाज, वस्त्र और ग्रंथों को कुतर डाला। उस मूषक को रोकने का भरसक प्रयास किया गया किंतु वह पकड़ से बाहर रहा। उसने सारे आश्रम को अस्त-व्यस्त कर दिया।

जब वह थक हार गए तो अपने इस विघ्न से उभरने के लिए विघ्नहर्ता की शरण में गए और उनकी उपासना करने लगे। गणेश जी महर्षि की उपासना से हर्षित हुए और उपद्रवी मूषक को पकड़ने के लिए अपना पाश फेंका। पाश को अपनी तरफ बढ़ते देख मूषक भागता हुआ पाताल लोक पहुंच गया। पाश ने उसका पीछा न छोड़ा और उसे बांधकर गणेश जी के सामने उपस्थित किया।

गणेश जी की बलिष्ठ काया को देख कर वह उनका स्तवन करने लगा। गणेश जी उसके स्तवन से खुश हुए और बोले,” तुमने महर्षि पराशर के आश्रम में इतनी उथल-पुथल क्यों मचाई यही नहीं उनका ध्यान भी भंग किया।”

मूषक कुछ न बोला चुपचाप खड़ा रहा। गणेश जी आगे बोले,”अब तुम मेरे आश्रय में हो इसलिए जो चाहो मुझ से मांग लो।”

गणेश जी के मुख से ऐसे वचन निकलते ही मूषक का घमंड उत्पन्न हुआ और वह बड़े गर्व से गणेश जी को बोला,” मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। हां, अगर आप चाहें तो मुझसे कुछ मांग सकते हैं।”

गणेश जी उसकी बात सुनकर मुस्कुराए और बोले,” ठीक है मूषक अगर तुम मुझे कुछ देना चाहते हो तो तुम मेरे वाहन बन जाओ।”

उसी पल से मूषक गणेश जी का वाहन बन गया लेकिन जैसे ही गणेश जी ने मूषक पर पहली स्वारी की तो गणेश जी की भारी भरकम देह से वह दबने लगा। मूषक का घमंड चूर-चूर हो गया और वह गणेश जी से बोला,” गणपति बप्पा! मुझे माफ कर दें। आपके वजन से मैं दबा जा रहा हूं।”

अपने वाहन की प्रार्थना पर गणेश जी ने अपना भार कम कर लिया। इस घटना के उपरांत से ही मूषक गणेश जी का वाहन बनकर उनकी सेवा में लगा गया। गणेश जी का चूहे पर बैठना इस बात का संकेत है कि उन्होंने स्वार्थ पर विजय पाई है और जनकल्याण के भाव को अपने भीतर जागृत किया है।

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