नेहरू चाहते तो हिंदू-मुस्लिम में कभी न होता विवाद, लेकिन…

नई दिल्ली। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की छवि एक धर्मनिरपेक्ष राजनेता की रही। और काफी हद तक इस छवि ने ही उनके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता भी तैयार किया था। मगर कुछ घटनाएं बताती हैं कि नेहरू जरूरत पड़ने पर धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने के लिए जोखिम नहीं उठाते थे। उल्टे वे धर्म संबंधी विवादों या पेचीदा स्थितियों को सुलझाने के प्रयत्न करने के बजाय पीछे हट जाते थे।
बात आजादी से कहीं पहले 1920 से लेकर 1929 के बीच की है। इस दौरान देश के हिंदुओं और मुसलमानों में खूब विवाद होते थे। विवाद का कारण मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली नमाज और मंदिरों में होने वाली सुबह व शाम की आरती का एक साथ होना था।
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आरती की घंटियों की आवाज से मुस्लिम नाराज होते, जबकि अजान की आवाज से हिंदुओं में नाराजगी रहती। उस दौर में कांग्रेस एक ऐसी पार्टी के रूप में थी, जिसे देश की जनता का प्रतिनिधि माना जाता था। ऐसे में इन झगड़ों को सुलझाने का जिम्मा कांग्रेस पर था।
नेहरू उन दिनों में कांग्रेस के बड़े नेता थे। इस हैसियत से उन्हें इस मामले में निर्णायक भूमिका निभानी थी। यूं भी नेहरू को धर्मनिरपेक्ष माना जाता था और वे खुद भी अपने व्यवहार से यह जताने का प्रयत्न करते थे कि वे धार्मिक न होकर धर्मों से परे हैं।
मगर जब हिंदु-मुस्लिम झगड़ों को सुलझाने की बात आई तो नेहरू ने कदम पीछे हटा लिए। उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है ‘सबकुछ सुलझा पाना मुश्किल था और मेरी इसमें बहुत ज्यादा रुचि नहीं थी।” अंतत: हुआ यह कि झगड़े सुलझने के बजाय बढ़ते गए और हिंदू-मुस्लिमों के बीच खाई बढ़ती चली गई।





