जब Steve Jobs ने Adobe के CEO को भेजा गुस्से भरा ईमेल

Apple और Adobe का रिश्ता टेक इंडस्ट्री के सबसे पुराने और सबसे ज्यादा चर्चाओं में रहा है। एक तरफ, ये दोनों कंपनियां डेस्कटॉप पब्लिशिंग की शुरुआत से ही पार्टनर रही हैं। जबकि दूसरी तरफ ये Flash टेक्नोलॉजी जैसे मुद्दों पर खुली जंग भी देखने को मिली है। इस उतार-चढ़ाव भरे इतिहास का एक दिलचस्प किस्सा 2005 का है, जब Apple के CEO स्टीव जॉब्स ने Adobe के को-फाउंडर ब्रूस चिजेन को एक बहुत ही सख्त और गुस्से वाला ईमेल भेजा था। आइए जानते हैं कि उस ईमेल में Apple के CEO ने Adobe के को-फाउंडर से ऐसा क्या कहा था।

कैसे हुई विवाद की शुरुआत?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार स्टीव जॉब्स को पता चला कि एडोब एप्पल के कर्मचारियों को भर्ती करने की कोशिश कर रही है। जॉब्स का मानना था कि एप्पल और एडोब के बीच एक अनौपचारिक ‘नो-पोचिंग’ एग्रीमेंट था, जिसके तहत कोई भी कंपनी दूसरी कंपनी के कर्मचारियों को हायर नहीं करेगी। ऐसे में जब स्टीव जॉब्स को पता चला कि एडोब ने एप्पल के एक कर्मचारी को हायर कर लिया है और दूसरों से संपर्क कर रही है, तो उन्होंने एडोब के CEO Bruce Chizen को एक ईमेल भेजने का फैसला किया।

Steve Jobs ने ईमेल में क्या कहा?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 26 मई 2005 को भेजे गए इस ईमेल में स्टीव जॉब्स ने साफ तौर पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने लिखा कि Apple की यह क्लियर पॉलिसी थी कि वह Adobe से कर्मचारियों को भर्ती नहीं करेगा, लेकिन Adobe इस पॉलिसी का पालन नहीं कर रहा था। ईमेल के आखिर में जॉब्स ने एक कड़ा मैसेज देते हुए लिखा, ‘हम दोनों में से किसी एक को अपनी पॉलिसी बदलनी होगी।

कृपया मुझे बताएं कि वह कौन होगा।’ उसी दिन, ब्रूस चिजेन ने भी जॉब्स को जवाब दिया और कहा कि उनकी समझ के अनुसार दोनों कंपनियों के बीच यह समझौता सिर्फ सीनियर-लेवल के कर्मचारियों पर लागू होता था। इतना ही नहीं Chizen ने ये भी दावा किया कि एप्पल के रिक्रूटर्स ने जूनियर कर्मचारियों से कांटेक्ट किया है।

फिर कुछ ऐसे हुआ मामले का खुलासा

जानकारी के मुताबिक यह ईमेल सालों बाद 2010 में सामने आया जब टेक कंपनियों के खिलाफ एक एंटीट्रस्ट मुकदमा दायर किया गया। मुकदमे में आरोप लगाया गया था कि Apple, Adobe और Google जैसी कंपनियों ने मिलकर यह समझौता किया था कि वे कोल्ड कॉल करके एक-दूसरे के कर्मचारियों को नौकरी पर नहीं रखेंगी। अमेरिका में ऐसे समझौते गैर-कानूनी माने जाते हैं जिसकी वजह से कंपनियों को आखिरकार लगभग 415 मिलियन डॉलर में मुकदमा सेटल करना पड़ा।

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