कहीं ‘सर्टिफिकेट’ की रेस आपके बच्चे का मासूम बचपन तो नहीं छीन रही?

आज के दौर में स्कूल एडमिशन से लेकर कालेज प्रोफाइल और ओलंपियाड रैंकिंग तक, हर स्तर पर प्रतिस्पर्धा का एक नया जाल बिछा है। माता-पिता के लिए सर्टिफिकेट अब सिर्फ उपलब्धि नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच बन गए हैं।

वे इन कागजों के जरिये खुद को यह तसल्ली देते हैं कि उनके बच्चे का भविष्य सुरक्षित है, लेकिन इस होड़ में हम यह भूल रहे हैं कि फोमो (फीयर आफ मिसिंग आउट यानी किसी चीज का छूट जाना)और फोलो (फीयर आफ लूजिंग आउट यानी पिछड़ जाने का डर) की यह परवरिश बच्चों के मासूम बचपन को निगल रही है।

ब्रांड बन रहा बचपन
हैरानी की बात है कि आज पांच साल के बच्चों के पोर्टफोलियो तैयार किए जा रहे हैं। सच तो यह है कि बच्चों को शायद प्रतिस्पर्धा शब्द का मतलब भी नहीं पता होना चाहिए। माता-पिता अक्सर सामाजिक दबाव में आकर इस दौड़ का हिस्सा बन जाते हैं- सिर्फ इसलिए कि ‘हमारा बच्चा पीछे न रह जाए’। हम बच्चों को एक ब्रांड के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उन्हें अभी यह भी नहीं पता कि वे खुद कौन हैं।

व्यक्तित्व के विकास से पहले ही उन पर उपलब्धियों का बोझ लाद देना उनके खुद को जानने-समझने की प्रक्रिया को बाधित कर रहा है। बड़े-बड़े स्कूलों के विज्ञापन यह साबित करते हैं कि वे बच्चों को कुछ खास बना देंगे। समाज में फैली मान्यता के चक्कर में माता-पिता इस तनाव में रहते हैं कि बड़े से बड़े स्कूल में बस किसी तरह बच्चे का एडमिशन हो जाए।

भावनाओं की लग रही रेस
आज माता-पिता प्रमाणपत्रों को एक प्रकार से भावनात्मक बीमा के रूप में देख रहे हैं। जबकि अगर किसी बच्चे की सफलता केवल कागजी उपलब्धियों पर टिकी होती है, तो उसके जीवन की वास्तविक कहानी से सहजता और जिज्ञासा गायब हो जाती है। यहां मुझे वाल्डोर्फ जैसी प्रणालियां सराहनीय लगती हैं, जहां शुरुआती वर्षों में किताबी ज्ञान के बजाय दुनिया को खोजने और हाथों से कुछ रचने पर जोर दिया जाता है।

स्कूलों में छोटे बच्चों के इंटरव्यू लेना अपने आप में बेतुका है। इंटरव्यू तो शिक्षकों का होना चाहिए कि क्या वे हमारे बच्चों के भविष्य को संवारने के योग्य हैं? क्या वे छह या आठ घंटे तक बच्चे के व्यक्तित्व विकास में योगदान दे पाएंगे या सिर्फ उसे एक मशीन बना देंगे!

नहीं मिलती असफल होने की स्वतंत्रता
जब हर गर्मी की छुट्टियों के दौरान मिलने वाले समय और हर हाबी को कालेज प्रोफाइल के नजरिए से तय किया जाता है, तो बच्चा असफल होने की स्वतंत्रता खो देता है। सीखने का असली मतलब ही यही है कि आप कुछ गलतियां करें, गिरें और फिर जानें कि आप किस चीज में अच्छे हैं।

अगर आप एक मछली को पेड़ पर चढ़ने की उसकी क्षमता से आंकेंगे, तो वह पूरी जिंदगी खुद को मूर्ख समझती रहेगी। हर बच्चा एक जैसा नहीं होता। बच्चों को स्कूल से आकर बाहर खेलने, गिरने और खुद को खोजने का समय मिलना चाहिए। यही संघर्ष और छोटी-छोटी असफलताएं भविष्य में उनकी यादें बनती हैं और उन्हें बेहतर इंसान बनने में सहायता देती हैं।

माता-पिता की भूमिका
पिछड़ जाने या हर चीज में अपना नाम रोशन करने की चिंता अभिभावकों में संक्रामक बीमारी की तरह फैलती है। यह तनाव सीधा बच्चों तक पहुंचता है। विज्ञापनों और होर्डिंग्स पर बच्चों के 98-99 प्रतिशत नंबरों के साथ फोटो लगाना और कोचिंग संस्थानों द्वारा उनका प्रचार करना शिक्षा का सबसे भयावह रूप है।

अभिभावकों को चाहिए कि वे ऐसे समूहों से जुड़ें, जो इस अंधी दौड़ का हिस्सा नहीं हैं। स्कूल काउंसलर्स से और पीटीएम में इन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। हमें यह समझने की जरूरत है कि सर्टिफिकेट का ढेर इस बात की गारंटी नहीं है कि बच्चा भविष्य में सफल या खुश होगा!

किताबों के बाहर भी है दुनिया
ओलंपियाड और समर स्कूल के प्रमाणपत्र जुटाने के चक्कर में बच्चे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण माइलस्टोन खो रहे हैं- जो है उनका बचपन। पुराने समय में बच्चे सूरज ढलने तक बाहर साइकिल चलाते और खेलते थे और वे आज भी सफल हैं। असल विकास किताबों में नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों में है। समर स्कूल के बजाय बच्चों को समुद्र किनारे ले जाएं।

उन्हें प्रकृति के करीब रहकर यादें बनाने दें। माता-पिता को ईमानदारी से खुद से पूछना चाहिए- अगर आप अपने बच्चे से प्यार करते हैं, तो उन्हें इस मानसिक दबाव में क्यों डाल रहे हैं? प्रमाणपत्र महज कागज के टुकड़े हैं, लेकिन खोया हुआ बचपन कभी लौटकर नहीं आता। बच्चों को अपनी गति से बढ़ने दें, उन्हें ब्रांड नहीं, इंसान बनने दें।

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