हेडिंग के लफ्ज़ और बाईलाइन में नाम पढ़ कर अब तक आपने राय तो बना ही ली होगी. ये भी तय कर लिया होगा कि इस लिखे को कैसे जज करना है. बहरहाल जो भी हो हमें तो अपनी बात कहनी ही है. अपनी चिंताओं, अपने फ्रस्ट्रेशन को ज़ाहिर करना ही है. जज करने वालों का पहले ही कौन सा घाटा है!
ये वीडियो मुझे वाकई बहुत डिस्टर्ब कर रहा है. तेलंगाना के निजामाबाद जिले का एक गांव है ऐलापुर. यहां के एक जूनियर कॉलेज के प्रिंसिपल की बस मॉब लिंचिंग नहीं हुई, बाकी सब हुआ. घेरना, शोर मचाना, माफ़ी मांगने पर मजबूर करना वगैरह-वगैरह. वजह सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने झंडा फहराते वक़्त जूते पहन रखे थे. या वजह ये भी हो सकती है- है ही – कि इस शख्स का नाम ‘यकीनुद्दीन’ था. दर्जन भर से ज़्यादा गुंडों ने उन्हें घेर लिया और देशभक्ति का अपना वाला काढ़ा उनके हलक में उड़ेलने की कोशिश हुई. नारे लगे, शोर मचा, परेड़ निकाली गई.
यकीनुद्दीन झंडा फहराते हुए.
यकीनुद्दीन ने खूब समझाने की कोशिश की कि ऐसा कोई रूल नहीं है. सभी लोग ऐसे ही करते हैं. प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सब. इससे ध्वज का कोई अपमान नहीं होता वगैरह-वगैरह. लेकिन किसी ने न सुनी. खुद को देशभक्त साबित करने का कोई मौका जब हाथ आता है, तो उसे छोड़ भी कैसे सकते हैं? ये भीड़ वही है. उंगली कटा कर शहीदों की लिस्ट में नाम लिखवाने की तमन्नाई. खुद को देशभक्त साबित करने के लिए इन्हें किसी ‘आसान शिकार’ की ज़रूरत पड़ती है. ऐसी देशभक्ति पर थूकने का मन करता है.
आप वीडियो देख लीजिए, फिर बात करते हैं:
लाल किले पर पीएम ने झंडा फहराया. न उन्होंने जूते उतारे, न वहां मौजूद वीआईपी लोगों के हुजूम में से किसी ने. तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद, फिल्म स्टार्स जब झंडा फहराते हैं, जूते पहने रहते हैं. आज तक ये मुद्दा ज़िक्र के काबिल तक नहीं था. अब अचानक देशभक्ति को आंकने के नए-नए पैमाने ईजाद हो रहे हैं. नई परिभाषा बन रही है. अब जब तक चीखा न जाए, कोई नहीं मानता आप देश से प्यार करते हैं.
प्रधानमंत्री जी भी नहीं उतारते.
मुझे अपना बचपन याद आता है. अलग-अलग धर्मों के इस मुल्क में 15 अगस्त और 26 जनवरी ये दो ही ऐसे त्यौहार थे, जो सबके साझे होते थे. नारे तब भी लगते थे. वंदे मातरम. भारत माता की जय. कितनी मुहब्बत हुआ करती थी उनमें. क्योंकि इनका इस्तेमाल किसी को डराने के लिए नहीं होता था. दहशत का प्रतीक नहीं बने थे ये नारे. भारत माता की जय कहना कितना सुकून भरा था. कोई जोर ज़बरदस्ती नहीं करता था. अब जब डंडे के जोर पर कहलवाने की कोशिश होती है, तो अंदर एक हिकारत सी जन्म लेने लगती है. मुझे डर है कि राष्ट्रवाद का ये गुंडई वाला स्वरुप इन प्रतीकों के प्रति हमारी सहजता न ख़त्म कर दे.
अमित शाह ने भी पहने ही रखे थे.
वो वक़्त तो आ भी चुका कि अगर किसी चौराहे पे चार लोग इकट्ठा होकर ‘भारत माता की जय’ कहने लगे, तो मांए अपने बच्चों को उधर जाने से मना कर देती हैं. उन्हें लगता है कि कुछ न कुछ बवाल होने की संभावना है. ये नारे नारे नहीं रहे अब. कर्कश चीखों में तब्दील हो चुके हैं. इनसे कोई देशभक्ति नहीं जागती मन में. डर लगता है.
‘कभी ख़ुशी कभी ग़म’ फिल्म के एक सीन में जब राष्ट्रगान आया था तो कितने उत्साह से सारा सिनेमा हॉल खड़ा हुआ था मुझे आज भी याद है. साथ-साथ गाया भी था. अब जब हर फिल्म देखने से पहले बजता है, तो बेमन से खड़ा होता हूं. मन बागी भी होता है कि बैठा रहूं. फिर दिमाग चेताता है कि खड़ा हो जा वरना कोई न कोई थपड़ा देगा. मेरा राष्ट्रगान मुझसे अजनबी होता जा रहा है. मुझे उससे जो इश्क है उसके इर्द-गिर्द किसी की घृणा आ लिपटी है. मुझे इस घृणा से दिक्कत हो रही है. मुझे राष्ट्रवाद के इस घिनौने मॉडल से दिक्कत हो रही है. और नहीं, मैं पाकिस्तान नहीं जाने वाला.
मुझे यकीन करने दीजिए कि ये वक्ती दौर है. इस चीखती हुई भीड़ का गला भी बैठेगा एक दिन. वो दिन भी लौटेगा जब मैं ‘भारत माता की जय’ का नारा पूरी सहजता से लगा पाऊंगा. ना कि किसी भीड़ की दहशत से घबरा कर. साहिर की तरह मुझे भी इंतजार है कि ‘वो सुबह कभी तो आएगी’.