इस्तीफे तो दे दीं, अब राज्यसभा वापस कैसे आएँगी मायावती!

संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही विपक्ष का सरकार पर हमला करना भी शुरू हो गया है. इस सत्र का पहला बड़ा हमला मायावती ने बोला. राज्यसभा में उन्होंने सरकार पर निशाना साधा, तो वहीं पूरी बात ना किए जाने पर उपसभापति से भी वह नाराज हुईं. मायावती नाराज होकर राज्यसभा से बाहर चली गई और इस्तीफा देने की बात कह दी. बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का राज्यसभा में कार्यकाल अप्रैल 2018 में खत्म हो रहा है. प्रदेश की विधानसभा में पार्टी के पास इतने आंकड़े नहीं हैं कि 2018 में वह एक बार फिर राज्यसभा में पहुंच सके.
उत्तर प्रदेश विधानसभा के 2007 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल और पार्टी का वोट शेयर भी 30 फीसदी से अधिक रहा. यह आंकड़े प्रदेश की राजनीति में मायावती के लिए इसलिए अहम रहे क्योंकि उन्हें राज्य में उनके दलित वोट बैंक के अलावा भी अगड़ी जातियों से वोट मिला और वह प्रदेश की सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता पर काबिज हुईं.
एक दशक बीतता है और 2017 के विधानसभा चुनावों ने मायावती के लिए अंकगणित को पूरी तरह से उलट दिया. राज्य विधानसभा की 403 सीटों में उनकी पार्टी को महज 19 सीटों पर जीत दर्ज हुई. सीट को छोड़कर सेंधमारी उनके वोट बैंक में लगी और दलित बाहुल सीटों में से 84 फीसदी सीटें बीजेपी के खाते में गईं. साथ ही दलित वोट बैंक का 41 फीसदी वोट भी बीजेपी को मिला.
बस अब एक ही रास्ता!
वहीं 2018 में एक बार फिर राज्यसभा जाने के लिए उन्हें उनके पास महज एक विकल्प बचता है कि वह समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर लें. आंकड़ों के मुताबिक दोनों दल एक साथ मिलकर राज्यसभा में दो सदस्यों को भेज सकते हैं. लेकिन क्या बिहार में आरजेडी और जेडीयू की तर्ज पर मायावती अपने विरोधी समाजवादी पार्टी के साथ यह समझौता करने के लिए तैयार होंगी. गौरतलब है कि यदि किसी सूरत में मायावती राज्यसभा पहुंचने के लिए यह कदम उठाती हैं तो इसका क्या असर एक साल बाद 2019 में होने वाले आम चुनाव पर पड़ सकता है, का आंकलन मायावती को करना होगा.





