अगले 5 साल में 50 हजार भारतीयों को इजरायल देगा नौकरी

 तेल अवीव के बेन गुरियन एयरपोर्ट पर उतरते ही एक अनोखा नजारा देखने को मिलता है। दुबई या अबू धाबी के एयरपोर्ट पर भारतीयों को देखना आम बात है, लेकिन यहां सुरक्षा जांच या इमिग्रेशन काउंटर पर पंक्तिबद्ध होते हुए आप एक साथ कई भारतीय चेहरे आसानी से पहचान लेंगे।

ये ज्यादातर निर्माण कार्य, देखभाल (केयरगिविंग) या होटल इंडस्ट्री में काम करने वाले युवा हैं, जो इजरायल की श्रम शक्ति की कमी को पूरा करने पहुंचे हैं।

इजरायल में भारतीय

पश्चिम एशिया के संघर्ष के बावजूद ये भारतीय यहां अच्छे वेतन, सुविधाओं और सम्मानजनक माहौल के साथ अपनी किस्मत संवार रहे हैं।

पूरे देश में तकरीबन 20 हजार भारतीय काम करते हैं जो पश्चिम एशिया संघर्ष के तीन महीनों के दौरान युद्ध के माहौल में रहने के अभ्यस्त हो चुके हैं। जैसे ही मिसाइल हमले का सायरन बजता है, ये एक सामान्य इजरायली नागरिक की तरह ही शेल्टर पहुंच जाते हैं।

दैनिक जागरण ने यहां काम करने वाले कई भारतीयों से बात की और तकरीबन सभी ने कहा कि कामकाज छोड़ कर वापस भारत जाने का उनका कोई इरादा नहीं है। हालांकि परिजनों की तरफ से वापस आने का आग्रह होता रहता है।

आठ महीने पहले हाइफा शहर के पास सफेद कस्बे में एक होटल में काम पर पहुंचे इंदर बाकर बताते हैं, ‘आने के कुछ ही महीने बाद युद्ध शुरू हो गया, लेकिन यहां खतरा जैसा कुछ महसूस नहीं होता। घर वाले फोन करके वापस बुलाते हैं, तो मैं उन्हें बताता हूं कि पूरा माहौल कितना सामान्य है। लोग अपने काम ठीक से कर रहे हैं।’

इसी होटल में दो साल से काम कर रहे राहुल हर महीने करीब दो लाख रुपये घर भेजते हैं। होटल की तरफ से रहने-खाने का पूरा इंतजाम है। राहुल कहते हैं, ‘भारत के होटल इंडस्ट्री और यहां के बीच बहुत अंतर है। यहां सीनियर स्टाफ भी हमें बराबर का दर्जा देता है, कोई छोटा काम करने वाला महसूस नहीं कराता।’

सरकारी माध्यम से फिलहाल करीब 20,000 भारतीय इजरायल में काम कर रहे हैं। इनमें निर्माण क्षेत्र और केयरगिविंग दोनों शामिल हैं। इजरायल सरकार और निर्माण कंपनियां भारतीय कामगारों को खूब पसंद करती हैं।

अगले पांच साल में 50,000 भारतीयों को इजरायल लाने की तैयारी

हाल ही में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत अगले पांच साल में 50,000 अतिरिक्त भारतीय कामगारों को लाने की तैयारी है, जिसे आगे बढ़ाकर एक लाख तक पहुंचाने की बात भी यहां के अधिकारी बताते हैं।

वजह यह है कि इजरायल सरकार ने वर्ष 2030 और इसके आगे भी देश की जनसंख्या बढ़ाने को प्रोत्साहन देना शुरू किया है।

इसके लिए हर शहर में विस्तार निर्माण का काम चल रहा है। इजरायल के हर शहर में दूर से ही बड़े-बड़े क्रेन दिखाई देने लगते हैं जो आवासीय इकाइयों आदि का निर्माण कर रहे हैं।

इन ऊंचे क्रेनों को अब मजाक में राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा देने की बात होती है। साथ ही अरब मूल के कामगारों के अवसर घटने से भारतीयों की मांग बढ़ी है। भारतीय कारीगरों की मेहनत, कौशल और अनुशासन यहां सराहा जा रहा है।

कई भारतीय केयरगिवर बुजुर्ग इजरायलियों की देखभाल करते हुए खुद को सुरक्षित रखने का जज्बा दिखा रहे हैं। वे कहते हैं कि इजरायली परिवार उन्हें पूरा सहयोग देते हैं और सुरक्षित कमरे उपलब्ध कराते हैं।

उत्तरी इजरायल के हाइफा शहर में स्थित राम्बम हॉस्पीटल में एक इजरायली वृद्ध की देखरेख करने वाले केरल के जोसेफ ने बताया कि वह अकेले ही उक्त वृद्ध की पूरी देख-रेख करता है।

अमेरिका में एक बड़ी कंपनी स्थापित करने के बाद उक्त यहूदी वृद्ध व्यक्ति अब अंतिम समय इजरायल में व्यतीत करने आये हैं। पत्नी नहीं है जबकि एक पुत्र व पुत्री अमेरिका में ही हैं। जोसेफ बताते हैं कि वह रियाद के एक होस्पीटल में भी अपनी सेवा दे चुके हैं लेकिन विगत तीन वर्षों से हाइफा में ही हैं और बेहतरीन जीवन जी रहे हैं।

एक भारतीय कामगार ने बताया, ‘एक बार बाजार में था, अचानक सायरन बजने लगा। समझ नहीं आया क्या करूं। पास खड़ा एक स्थानीय व्यक्ति ने तुरंत समझाया कि जहां भी घर या दुकान दिखे, वहीं शरण ले लो। अब हम सब प्रोटोकोल जान चुके हैं। मोबाइल अलर्ट आते ही सात मिनट का समय मिल जाता है।’

साफ है कि इजरायल की कंपनियां व जनता भारतीयों की विश्वसनीयता पर भरोसा जता रही हैं, जबकि भारतीय युवाओं को बेहतर आय और अनुभव मिल रहा है।

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