हेरिटेज में शुमार होना तो दूर, संभाला भी नहीं जा सका शहर का पहला पन बिजली घर

  • अमृतसर. जालंधर जीटी रोड से जब शहर में प्रवेश करते हैं तो सुल्तानविंड नहर पुल के बाएं तरफ झाड़ियों में छिपा है शहर को सबसे पहले बिजली मुहैया करवाने वाला पन बिजली घर। बड़े-बड़े डायनमो, पानी के डायवर्शन के लिए बनी पुली और जर्जर शैड। इसका काफी सामान गायब हो चुका है लेकिन फिर भी यह अपनी समृद्ध उपलब्धि बयां करने को काफी है। यह वही प्रोजेक्ट है जिसने दरबार साहिब को सबसे पहले बिजली पहुंचाई। लेकिन अनदेखी के कारण आज यह प्रोजेक्ट कबाड़ बन गया है।
    हेरिटेज में शुमार होना तो दूर, संभाला भी नहीं जा सका शहर का पहला पन बिजली घर
     
    20 लाख में तैयार हुआ था
    उक्तनहर जिसे अपर बारी दोआब नहर (जंडियाला वाली नहर) के रूप में जाना जाता है। चूंकि यहां बिजली बनती थी और तारों से सप्लाई होती थी जिस कारण इस पुल का नाम तारांवाला पुल भी पड़ गया। खैर, अंग्रेजों ने शहर की बिजली की जरूरत को महसूस करते हुए 1915-20 के बीच करीब 20 लाख की लागत से इस पन बिजली घर को तैयार करवाया था। इतिहास के मर्मज्ञ नरेश जौहर कहते हैं कि इससे पहले शहर में रोशनी के लिए जगह-जगह पोल लगा कर उन पर मिट्टी के लैंप लगाए जाते थे और शाम को अमृतसर म्यूनिसिपल कमेटी के मुलाजिम इसमें मिट्टी का तेल डाल कर जलाया करते थे। उनका कहना है कि उस दौरान के कमेटी के सेक्रेटरी सी माल्डसन की देखरेख में यह प्रोजेक्ट तैयार हुआ था।
     
    नहर पर पानी रोकने के लिए बने बैरिकेड्स से पहले पानी को डायवर्ट किया गया था और किनारे बने उक्त प्रोजेक्ट के जरिए फिर नहर में ही छोड़ा गया था। यहां पर तीन बड़े-बड़े डायनमो हैं जिनमें छह पुलियों के रास्ते पानी सप्लाई होता था। बंद होने के बाद इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। आज हालात यह हैं कि यह झाड़ियों में दफन होकर रह गया है। इसका काफी सामान लोगों ने चोरी कर लिया। जो कुछ बचा है वह बारिश के दिनों में पानी में जंगाल खा रहा है। हालांकि इसे अगर संरक्षित किया जाए तो शहर के लोगों के अलावा बाहर से आने वाले लोगों को भी इसके बारे बताया जा सकता है। भूपिंदर का कहना है कि विगत में डीसी रवि भगत से मिल कर उन्होंने इसे संरक्षित करने की मांग उठाई थी और टूरिज्म विभाग ने भी रुचि ली थी लेकिन उनके तबादले के बाद मामला खटाई में पड़ गया।
     
    बंटवारे के आसपास यह प्रोजेक्ट बंद हो गया
    आलमीविरासत फाउंडेशन के प्रधान भूपिंदर सिंह संधू, जो कि इस पर किताब भी लिख चुके हैं, ने बताया कि अंग्रेजों ने इससे तैयार होने वाली बिजली को दरबार साहिब, माल रोड, कचहरी में सबसे पहले इस्तेमाल किया। बताया जाता है कि बिजली वाला चौक में सबसे पहले बिजली आई थी जिस कारण उसका नाम इसी पर पड़ गया। उनका कहना है कि देश के बंटवारे के आसपास यह प्रोजेक्ट बंद हो गया क्योंकि बिजली की और तकनीक चुकी थी।
    जिस तरीके से भविष्य में कोयला संकट गहराने वाला है, इसे फिर से तैयार कर काम में लाया जा सकता है। सरकार पुरानों को रेनोवेट करे और नहरों पर नए प्रोजेक्ट तैयार कर बिजली का प्रबंध पहले से करे।- भूपिंदरसिंह
     
     
Back to top button