शाैर्य, शहादत और समृदि्ध का कारगिल: जब पहाड़ गरजे और भारत ने रचा विजय का इतिहास, 527 अमर वीरों को नमन

कारगिल विजय दिवस 1999 के युद्ध में भारतीय सैनिकों के अदम्य शौर्य, बलिदान और ऐतिहासिक विजय को नमन करने का अवसर है। आज का कारगिल वीरों की विरासत को संजोए हुए मजबूत सुरक्षा, बेहतर बुनियादी ढांचे और तेज विकास के साथ नए भारत की पहचान बन चुका है।

पहाड़ भी रोते हैं, पर 1999 की उस गर्मी में कारगिल के पहाड़ गरजे थे। बर्फीली चोटियों, कम ऑक्सीजन और कड़कड़ाती ठंड के बीच जांबाजों के हौसले हिमालय से ऊंचे थे। सामने दुश्मन की बंदूकें थीं, किंतु पीछे करोड़ों भारतीयों के दिलों की धड़कन और हाथ में तिरंगा था। हर चोटी इम्तिहानथी, हर कदम पर मौत थी फिर भी कदम पीछे नहीं हटे। लद्दाख ने सिखाया कि मुश्किलें जितनी बड़ी हों, हिंदुस्तान का जवान उससे बड़ा होता है। 26 जुलाई…ये वो तारीख है जब कारगिल ने हार नहीं मानी और हमने इतिहास लिख दिया। यह विजय दिवस तब की चुनौतियों, आज की अभेद्य सामरिक मजबूती और लद्दाख के गौरवशाली विकास के सफर को याद करने का दिन है।

कारगिल विजय दिवस केवल एक तारीख नहीं बल्कि उन 527 अमर बलिदानियों के अदम्य साहस की जीवंत शौर्यगाथा है जिन्होंने देश की आन-बान और शान के खातिर अपने प्राण हथेली पर रख दिए थे। जब मोर्चे पर गरजती बंदूकों ने आसमान को धुएं से पाट दिया तब हमारे रणबांकुरों ने दुश्मन के सीने पर तिरंगा फहराने के लिए अपने सीने अड़ा दिए और उफ तक नहीं की।

कारगिल युद्ध के 27 वर्ष बाद आज बलिदानियों की याद में बना स्मारक ही नहीं, बल्कि पूरा जिला साहस, दृढ़ता और परिवर्तन का प्रतीक बनकर उभरा है। कभी गोलाबारी और युद्ध की विभीषिका झेलने वाला यह सीमावर्ती क्षेत्र आज उभरते वाणिज्यिक, पर्यटन और प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है। देश की सीमाओं की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सैनिकों की विरासत यहां की पहचान बनी हुई है।

लोगों को गर्व है कि वह इस क्षेत्र के बाशिंदे हैं। वे बताते हैं कि कारगिल आज भी रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सीमावर्ती जिला है, लेकिन बेहतर बुनियादी ढांचे और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था ने अब यहां अधिक स्थिर और सुरक्षित जीवन प्रदान किया है। हर वर्ष कारगिल विजय दिवस पर लोग ऑपरेशन विजय में सर्वोच्च बलिदान देने वाले 527 भारतीय वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और विकास, आशा और आत्मविश्वास की ओर बढ़ते कारगिल की प्रेरणादायक यात्रा का गौरव के साथ स्मरण करते हैं।

बुनियादी ढांचा और डिजिटल क्रांति
स्थानीय लोग मानते हैं कि श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग के उन्नयन से सड़क संपर्क में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। दूरदराज के क्षेत्रों तक दूरसंचार, इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं की पहुंच ने लोगों के दैनिक जीवन को बदल दिया है। बाजारों का विस्तार हुआ है, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार आया है तथा नए रोजगार के अवसरों ने लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाया है।

युद्ध की प्रमुख तिथियां

3 मई 1999 : चरवाहे ताशी नामग्याल ने बटालिक सेक्टर में पािकस्तानी घुसपैठ की सूचना दी।

5–7 मई 1999: सेना के गश्ती दल ने कारगिल, द्रास और बटालिक सेक्टरों में घुसपैठ की पुष्टि की।

15 मई 1999 : कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथी बजरंग पोस्ट के पास गश्त करते लापता हो गए। बाद में पाकिस्तानी सेना द्वारा बंदी बना लिए गए।

18–20 मई 1999: भारत ने पुष्टि की कि घुसपैठियों के साथ-साथ पाकिस्तानी सेना के नियमित सैनिकों ने भी रणनीतिक चोटियों पर कब्जा कर लिया है।

26 मई 1999: ऑपरेशन विजय औपचारिक रूप से शुरू किया गया। भारतीय वायु सेना ने ऑपरेशन सफेद सागर के तहत दुश्मन के ठिकानों पर हमले शुरू किए।

27–28 मई 1999: वायु सेना ने अभियान तेज किए। कई विमान अभियानों में क्षतिग्रस्त हुए या खो दिए गए।

13 जून 1999: भीषण संघर्ष के बाद भारतीय सेना ने महत्वपूर्ण तोलोलिंग चोटी पर पुनः कब्जा कर लिया।

20 जून 1999: कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाॅइंट 5140 पर कब्जा किया।

4 जुलाई 1999: भारतीय सेना ने ऐतिहासिक टाइगर हिल पर कब्जा कर लिया जो युद्ध का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

5–7 जुलाई 1999 : भारतीय सेना ने टाइगर हिल के आसपास की महत्वपूर्ण चोटियों और चौकियों पर भी नियंत्रण स्थापित कर अपनी स्थिति और मजबूत की।

7 जुलाई 1999 : कैप्टन विक्रम बत्रा पाॅइंट 4875 पर कब्जा करते समय वीरगति को प्राप्त हुए। उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

11 जुलाई 1999: अंतरराष्ट्रीय दबाव पर पाकिस्तान ने भारतीय क्षेत्र से सेनाएं हटाने की घोषणा की।

14 जुलाई 1999 : तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने घोषणा की कि ऑपरेशन विजय अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है।

26 जुलाई 1999: भारतीय सेना ने सभी पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ते हुए ऑपरेशन विजय को सफलतापूर्वक पूरा किया। इसी विजय की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।

युद्ध में भी रोशन रखा इंसानियत का चिराग
मई 1999 का महीना… कारगिल के बर्फीले पहाड़ और 5,500 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर जमा देने वाली हाड़ कंपकंपाती ठंड। समुद्र तल से 5,500 मीटर से भी अधिक ऊंचाई पर बटालिक सेक्टर का चोरबत ला का ये क्षेत्र जहां हवा इतनी विरल है कि सांस लेना भी जंग की तरह लगता है। बर्फीली हवाओं और दुर्गम पर्वत शृंखलाओं के बीच दुश्मन ऊंचाइयों पर कब्जा जमाए बैठा था। भारतीय सेना के लिए हालात बेहद कठिन थे। ऐसे वक्त में लद्दाख स्काउट्स के जांबाज कर्नल (तब मेजर) सोनम वांगचुक ने कमान संभाली। वे एक ऐसे जाबांज थे जिन्होंने युद्ध के बीच भी इंसानियत रोशन रखी।

स्थानीय भूगोल से वाकिफ अपने लद्दाखी वीरों के साथ कर्नल वांगचुक ने वह कर दिखाया जो नामुमकिन सा लग रहा था। दुश्मन की हर चाल को नाकाम करते हुए उन्होंने ऐसी जवाबी कार्रवाई की कि दुश्मन के पांव उखड़ गए। यह कारगिल युद्ध में भारत की पहली क्षेत्रीय विजय थी। यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जिसने आगे चलकर पूरे कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की सफलताओं की नींव रखी। इस अदम्य साहस, असाधारण सूझबूझ और बेमिसाल नेतृत्व के लिए उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र से अलंकृत किया गया।

कारगिल विजय दिवस पर पति सोनम वांगचुक को याद करती हुईं पद्मा आंगमो कहती हैं कि वे केवल महावीर चक्र के सम्मानित सैनिक ही नहीं थे बल्कि उस ऐतिहासिक अभियान के नायक भी थे जिसके लिए उन्हें वीरता पुरस्कार मिला। उस समय वे लद्दाख स्काउट्स के साथ सेवा दे रहे थे। उनके साथी वे सैनिक थे जो इन दुर्गम पहाड़ों को घर की तरह जानते थे और जिन्होंने पूरे साहस के साथ युद्ध लड़ा। सोनम हमेशा उनके बारे में गर्व और सम्मान के साथ बात करते थे। वे अक्सर कहते थे कि उन कठिन परिस्थितियों में एक-दूसरे का साथ ही उनकी सबसे बड़ी ताकत था।

वे बताती हैं कि घर में भी वांगचुक वैसे ही थे जैसे उनके साथी सैनिक उन्हें जानते थे- अनुशासित, निष्ठावान और अपनी उपलब्धियों के बारे में बहुत कम बोलने वाले। वे एक समर्पित पुत्र, स्नेही और सहयोगी पति तथा बच्चे के लिए बेहद स्नेहमय पिता थे।

सरहद पार के परिवारों की भी चिंता
पद्मा बताती हैं कि दृढ़ और साहसी होने के बावजूद सोनम का स्वभाव अत्यंत शांत, संवेदनशील और दयालु था। युद्ध के बीच भी उन्होंने अपनी मानवीय संवेदनाएं कभी नहीं खोईं। दुश्मन सैनिकों के शवों से मिले पत्रों को देखकर वे अक्सर कहते- सरहद के उस पार भी ऐसे परिवार हैं जो अपने प्रियजन के लौटने का इंतजार कर रहे हैं।

स्कूल में सीखे मूल्यों की कारगिल में असल परीक्षा
सोनम घर पर शायद ही कभी उस अभियान के बारे में विस्तार से बात करते थे। जब भी कुछ कहते तो उसे विनम्रता से केवल अनुशासन और टीमवर्क का परिणाम बताते। उनका मानना था कि यही मूल्य उन्होंने दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में खेलों के दौरान सीखे थे जिनकी असली परीक्षा कारगिल की चोटियों पर हुई। अपने लंबे सैन्य जीवन का अधिकांश समय उन्होंने 4 असम रेजिमेंट के साथ बितायाे। उनके लिए प्रत्येक जवान महत्वपूर्ण था।

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