विश्व युद्ध के दौरान इस तरह लखनऊ से भी हुई थी हथियारों की सप्लाई

लखनऊ स्थित चारबाग का लोकोमोटिव वर्कशॉप विश्व युद्ध का गवाह रह चुका है. मौजूदा समय का डीजल रेल इंजन लोकोमोटिव वर्कशॉप प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के ऑर्डिनेंस फैक्ट्री के रूप में कुछ हिस्से को इस्तेमाल में लिया गया था. 
हालांकि इस रेल वर्कशॉप को अंग्रेजों ने 1868 में अवध-रुहेलखंड रेलवे के नाम से स्थापित किया था, जो अब नॉर्दन रेलवे के अंदर आता है. 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया था, जब भी अंग्रेजों को यह महसूस हुआ कि भारत से आर्म्स और गोले बारूद बनाकर भेजना काफी सस्ता और कम समय में युद्ध के मैदान तक पहुंचाया जा सकता है तो फिर रेलवे के कारखाने के कुछ हिस्सों में ऑर्डिनेंस फैक्ट्री को स्थापित किया गया.
यह वर्कशॉप आजादी से पहले विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों द्वारा बंदूक, गोला, बारूद और दूसरे युद्ध में उपयोग होने वाले सामग्री तैयार करने में उपयोग में लिया गया था. फिर यहां से तैयार करके बंदूक, गोला, बारूद जिनको विश्व युद्ध में लड़ रहे सेना के जवानों तक यहां से भेजा जाता था.
जैसे-जैसे अंग्रेज अपने यातायात मार्ग को पूरे भारत में फैला रहे थे. उसी समय अंग्रेजों ने इस ऑर्डिनेंस फैक्ट्री को कानपुर शिफ्ट कर दिया. इस यार्ड को अंग्रेज ने अपने ट्रांसपोर्टेशन को बढ़ावा देने रेलवे को दिया था. इसके बाद यहां पर स्टीम इंजन को रिपेयर करने का काम होने लगा.
चारबाग स्थित यह लोकोमोटिव वर्कशॉप के हिस्से को जो कि अंग्रेज के समय ऑर्डिनेंस फैक्ट्री के रूप में काम में लाया जाता था जो अब डीजल इंजन और इलेक्ट्रिक इंजन के वर्कशॉप के रूप में उपयोग हो रहा है. यह वर्कशॉप ने अपनी 150वीं वर्षगांठ भी इसी महीने पूरी कर चुका है.
मुख्य कारखाना प्रबंधक विवेक खरे बताते हैं कि इसका उपयोग अंग्रेज अपने ऑर्डिनेंस फैक्ट्री के रूप में करते थे. यहां वह अपने गन गोलियां और बारूद तैयार करते थे. इसी लोकोमोटिव वर्कशॉप से सटे हुए लोकोमोटिव ट्रेनिंग स्कूल में उस समय की कुछ झलकियां भारतीय रेलवे ने संभाल कर रखी है. ब्रिटिश ऑर्डिनेंस फैक्ट्री या यूं कहें रेलवे के उन वर्कशॉप में बने बंदूक और दूसरे तमाम चीजों कि कुछ झलकियों को भारतीय रेलवे ने अभी तक संजोकर कर रखा है.





