विधानसभा चुनावों के नतीजे बदलेंगे केंद्र की सियासत के समीकरण

दरअसल लोकसभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस ने एक-एक कर पार्टी शासित राज्यों को भाजपा के हाथों गंवाने के बाद यूपीए के इतर क्षेत्रीय दलों को वरीयता देने की रणनीति बनाई। कर्नाटक चुनाव के बाद सबसे बड़ी कुर्सी जदएस को हाथ लगने के बाद क्षेत्रीय दलों के नेतृत्वकर्ताओं को लगा कि उनका पीएम बनने का सपना पूरा हो सकता है। यही कारण है कि कर्नाटक के नतीजे आने और कांग्रेस के रुख में परिवर्तन के बाद राकांपा, टीएमसी और टीडीपी के मुखिया क्रमश: शरद पवार, ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता के लिए चहल-पहल बढ़ाई।
नतीजे आने से पहले इन क्षत्रपों के इस बात का अहसास था कि सकारात्मक परिणाम के आने पर कांग्रेस विपक्षी एकता का खुद नेतृत्व करने की पहल भी कर सकती है। यही कारण है कि नायडू, ममता और पवार ने नतीजे आने से पहले इसी माह होने वाली विपक्षी दलों की बैठक टाल दी। यहां तक कि सोमवार को संसद के शीतकालीन सत्र की रणनीति बनाने के लिए आयोजित बैठक से सपा और बसपा ने दूरी बना ली। ऐसे में नतीजे के बाद जहां यूपीए में मजबूती आने के संकेत मिले हैं, वहीं दूसरी ओर क्षत्रपों की ओर से तीसरा मोर्चा बनाने की संभावनाओं को भी बल मिला है। हालांकि दोनों ही स्थिति में केंद्र के सियासी समीकरण में बदलाव आना तय है।





