रेल ट्रैक हादसों में युवा गंवा रहे जान: रात 6 से सुबह 6 बजे के बीचअधिक एक्सीडेंट

रेलवे ट्रैक हादसे में सबसे ज्यादा युवाओं की जानें जा रही हैं। ये युवा चलती ट्रेन से गिरने, चलती ट्रेन में चढ़ने या उतरने की कोशिश, अनधिकृत स्थानों पर ट्रैक पार करने या ट्रैक पर चलने के कारण रेल हादसों के शिकार हो रहे हैं। 

आधे से अधिक हादसे रात 6 बजे से सुबह 6 बजे के बीच हुए हैं। यह खुलासा रोहतक पीजीआई के फोरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी विभाग की एक अध्ययन में हुआ है। यह अध्ययन दो वर्षों (1 जनवरी 2022 से 31 दिसंबर 2023) के दौरान किए गए पोस्टमार्टम मामलों के विश्लेषण पर आधारित है।

अध्ययन के अनुसार, इस अवधि में विभाग में कुल 2,983 मेडिकोलीगल पोस्टमार्टम किए गए, जिनमें से 61 मामले (लगभग 2.04 प्रतिशत) रेलवे ट्रैक से जुड़े हादसों के थे। साल 2022 में 30 और साल 2023 में 31 मौतें दर्ज की गईं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, दोनों वर्षों में रेलवे से संबंधित मौतों का अनुपात लगभग समान रहा, जो इस समस्या की निरंतरता को दर्शाता है।

पुरुषों की मृत्यु दर अत्यधिक 

अध्ययन में सबसे प्रमुख निष्कर्ष यह रहा कि रेलवे ट्रैक हादसों में पुरुषों की मृत्यु दर अत्यधिक अधिक है। कुल 61 मृतकों में से 59 पुरुष (96.72 प्रतिशत) और केवल 2 महिलाएं (3.28 प्रतिशत) थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुषों की अधिक आवाजाही, रोजगार संबंधी यात्रा, जोखिमपूर्ण व्यवहार तथा चलती ट्रेन में चढ़ने-उतरने जैसी प्रवृत्तियां इस अंतर का प्रमुख कारण हो सकती हैं। 

आयु वर्ग के विश्लेषण से पता चला कि 21 से 40 वर्ष के आयु वर्ग में सबसे अधिक 32 मौतें (52.45 प्रतिशत) हुईं। इसके बाद 41 से 60 वर्ष के 20 मामले (32.78 प्रतिशत) सामने आए। 0 से 20 वर्ष आयु वर्ग में 6 (9.83 प्रतिशत) और 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में केवल 3 (4.91 प्रतिशत) मौतें दर्ज की गईं। शोधकर्ताओं के अनुसार, 21–40 वर्ष का वर्ग आर्थिक रूप से सक्रिय और अधिक यात्रा करने वाला होता है, जिससे रेलवे वातावरण में उनके संपर्क और जोखिम की संभावना बढ़ जाती है।

रात व सुबह के वक्त सबसे ज्यादा हादसे

शोधकर्ताओं ने समय के आधार पर विश्लेषण में पाया गया कि आधे से अधिक हादसे रात 6 बजे से सुबह 6 बजे के बीच हुए। इस समयावधि में 32 मौतें (52.45 प्रतिशत) दर्ज की गईं। सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे के बीच 15 (24.59 प्रतिशत) और दोपहर 12 बजे से शाम 6 बजे के बीच 14 (22.95 प्रतिशत) मौतें हुईं। विशेषज्ञों का कहना है कि रात के समय कम दृश्यता, थकान, शराब का सेवन व घटनाओं की देर से सूचना मिलना हादसों की संख्या बढ़ा सकता है। शोधकर्ताओं मौत के कारणों का भी विश्लेषण किया है। अध्ययन के मुताबिक 49 मामले (80.30 प्रतिशत) दुर्घटनात्मक थे, जबकि 12 मामले (19.67 प्रतिशत) आत्महत्या से जुड़े थे। अध्ययन में किसी भी मामले को हत्या के रूप में दर्ज नहीं किया गया।

त्योहारों के कारण सितंबर-नवंबर में हादसे ज्यादा

अधिकतर बड़े त्योहार सितंबर से नवंबर के महीने में आते हैं और इस दौरान रेलवे में यात्रियों की संख्या भी बढ़ जाती है। इस वजह से इन महीनों में रेलवे ट्रैक हादसों में मरने वालों की संख्या भी ज्यादा होती है। त्योहार के मुताबिक सितंबर से नवंबर के दौरान सबसे अधिक 20 मामले (32.78 प्रतिशत) सामने आए। जून से अगस्त और मार्च से मई में 15-15 मामले (24.59 प्रतिशत) दर्ज हुए, जबकि दिसंबर से फरवरी (सर्दी) में सबसे कम 11 मामले (18.04 प्रतिशत) सामने आए। पोस्टमार्टम के मुताबिक ज्यादातर मामलों में शरीर के कई हिस्सों में गंभीर चोटें पाई गईं। शरीर के हिस्सों के आधार पर विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि कुचलने वाली चोटें सबसे अधिक निचले अंगों (62.29 प्रतिशत) में थीं। इसके बाद पेट (45.9 प्रतिशत), सिर (34.42 प्रतिशत), ऊपरी अंग (29.5 प्रतिशत), छाती (26.22 प्रतिशत), चेहरा (19.57 प्रतिशत) और गर्दन (13.11 प्रतिशत) प्रभावित पाए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पैटर्न तेज रफ्तार ट्रेन की टक्कर या ट्रेन से कटने की स्थिति में शरीर के निचले हिस्से के पहले संपर्क में आने के कारण होता है।

फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने सुलझाई गुत्थी

अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया है कि कई बार रेलवे ट्रैक पर हुई मौतें दुर्घटना, आत्महत्या या संभावित हत्या के बीच अंतर स्पष्ट करना कठिन बना देती हैं। ऐसे मामलों में फॉरेंसिक विशेषज्ञों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, जो चोटों के पैटर्न, घटनास्थल की परिस्थितियों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर मृत्यु के वास्तविक कारण का निर्धारण करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रेलवे ट्रैक हादसों को रोकने के लिए जनजागरूकता, अनधिकृत ट्रैक पार करने पर सख्ती, रात के समय बेहतर निगरानी, और यात्रियों के लिए सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन आवश्यक है। यह अध्ययन नीति-निर्माताओं और रेलवे प्रशासन के लिए चेतावनी है कि युवाओं और पुरुषों में बढ़ते जोखिम को ध्यान में रखते हुए लक्षित सुरक्षा अभियान चलाए जाएं।

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