योगी सरकार अगर नहीं करती ये काम तो यूपी में लग जाता राष्‍ट्रपति शासन

गोलेश स्वामी

लखनऊ। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी में भी प्रदेश सरकार ने विधानमंडल का सत्र बुलाया है, क्योंकि यह उसकी संवैधानिक विवशता है। संविधान में यह बाध्यता है कि हर छह माह पर विधानमंडल का सत्र बुलाया जाना अनिवार्य है। यदि सत्र नहीं बुलाया तो संवैधानिक व्यवस्था का ब्रेक माना जाएगा और ऐसी स्थिति में संविधान की धारा-356 के तहत प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने की स्थिति आ सकती है, क्योंकि संविधान में कहीं भी अपरिहार्य स्थितियों में सत्र नहीं बुलाने की अवधि बढ़ाने या इसे बुलाने की अनिवार्यता को शिथिल करने की व्यवस्था नही है। शायद यही वजह है कि अपनी सरकार के दो कैबिनेट मंत्रियों चेतन चौहान और डा.कमल रानी वरुण को कोरोना के कारण खोने के बावजूद सरकार विधानमंडल सत्र 20 अगस्त से बुलाने को विवश है।

संविधान विशेषज्ञ कहते हैं कि कोरोना से पहले वर्ष-1919 में स्पेनिश फ्लू की आपदा आई थी। जिससे पूरी दुनियां में करीब पांच करोड़ मारे गए थे। लेकिन अपने देश के संविधान की रचना उसके बाद के वर्षों में की गई। उस समय शायद संविधान मनीषियों के मस्तिष्क में यह संज्ञान में नहीं आया कि कभी स्पेनिश फ्लू जैसी स्थिति कोरोना महामारी के रूप में दोबारा आ सकती है। शायद यही वजह है कि संविधान में राज्यों के विधानमंडलों और विधानसभाओं को छह माह में सत्र बुलाने की अवधि में छूट देने की कोई व्यवस्था नहीं की गई। जिसके परिणामस्वरूप स्थिति यह है कि कोरोना से जान का खतरा होने के बावजूद विधानसभा और विधान परिषद सदस्यों को सत्र में भाग लेने को मजबूर होना पड़ रहा है। क्योंकि सत्र टालने की कोई व्यवस्था संविधान में नही है। सत्र टालने का कोई भी प्रयास राज्य में संवैधानिक व्यवस्था का फेल्योर माना जाएगा और ऐसी स्थिति में सरकार या विधानसभा अध्यक्ष की रिपोर्ट पर राज्यपाल को केंद्र सरकार से राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करनी होगी।

एक संविधान विशेषज्ञ कहते हैं कि कोरोना जैसी वैश्विक बीमारी ने हमें यह विचार करने का मौका दिया है कि ऐसी आपदाओं या अपिरहार्य स्थिति में सत्र एक निर्धारित समय अवधि के अंदर नहीं बुलाने के लिए संविधान संशोधन जरूरी है। वे कहते हैं कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में तो राजनीतिक और संवैधानिक संकट के चलते सत्र बुलाने की बाध्यता समझ में आती है, लेकिन यूपी सहित अन्य राज्यों में कोई संवैधानिक या राजनीतिक संकट नही है। ऐसी स्थिति में भी सरकार सत्र बुलाने को विवश है। इसके मर्म में संविधान द्वारा तय की गई व्यवस्था का पालन करना है।

समस्त स्टाफ का हुआ कोरोना टेस्ट

विधानसभा के 20 अगस्त से बुलाए गए सत्र के मद्देनजर विधानसभा के पूरे 600 सदस्यों के स्टाफ का कोरोना टेस्ट कराया गया है। विधानसभा सचिवालय के अधिकृत सूत्रों के अनुसार सभी का टेस्ट निगेटिव आया है। यही नहीं, कोरोना से बचाव के सारे प्रयास किए जा रहे हैं। प्रदेश भर के डीएम को विधानसभा सचिवालय से निर्देश भेजे गए हैं कि विधायकों का कोरोना टेस्ट की व्यवस्था संबंधित जनपदों में ही उनके आवास पर की जाए। जिससे कोरोना पाजिटिव सदस्य सत्र में आकर दूसरो को बीमारी न दे सकें। इसके अलावा इतिहास में यह पहली बार होने जा रहा है कि सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने के लिए दर्शक दीर्घा में भी विधायक बैठेंगे।

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