एक व्यक्ति ने कोर्ट से लगाई गुहार, कहा- मैं विमंदित नहीं हूं, बिल्कुल सही हूं

एक व्यक्ति ने कोर्ट से गुहार लगाई है कि उसे विमंदित घोषित करने वाले आदेश को रद्द किया जाए, जबकि वह पूरी तरह ठीक है।

जयपुर के अतिरिक्त जिला न्यायालय क्रम-15 ने तीस नवंबर 2006 को इंजीनियरिंग छात्र को विमंदित घोषित करने के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर छात्र के पिता सूरजभान व अन्य को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों न पूर्व के आदेश को रद्द कर दिया जाए। अदालत ने जवाब पेश करने के लिए बीस मार्च का समय दिया है। अदालत ने यह आदेश विजयपाल की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दिए।

विधिक सेवा प्राधिकरण, जयपुर महानगर की ओर से विजयपाल को मुहैया कराई गई अधिवक्ता शालिनी श्योराण ने बताया कि अपीलार्थी के पिता ने मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1947 के तहत सीजेएम अदालत में प्रार्थना पत्र पेश किया था।

सवालों का दिया था सही-सही जवाब

प्रार्थना पत्र में कहा गया कि उसके बेटे विजयपाल को मनोचिकित्सा केन्द्र में भेजने के लिए रिसेप्शन ऑर्डर जारी किया जाए। जिसे स्वीकार करते हुए अदालत ने 30 नवंबर 2006 को अपीलार्थी को मनोचिकित्सा केन्द्र भेज दिया गया। वहां कुछ दिनों तक अपीलार्थी को भर्ती रखकर छोड़ दिया गया। इसके बाद वह मुम्बई चला गया।

गत दिनों उसने विधिक सेवा प्राधिकरण में संपर्क कर निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने के लिए प्रार्थना पत्र पेश किया। इस पर प्राधिकरण ने शालिनी श्योराण को प्रकरण में निशुल्क अधिवक्ता नियुक्त किया। श्योराण ने बताया कि सुनवाई के दौरान अदालत ने विजयपाल से कुछ सवाल भी किए, जिसका उसने सही-सही जवाब दिया।

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