यहां होली पर है अजीब परंपरा, चुने जाते हैं जीवनसाथी

होली का त्‍योहार देश के सभी राज्‍यों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। होली दक्षिण गुजरात में कुछ अलग ही तरह से मनाई जाती है। गुजरात में दक्षिण का क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य है। ऐसे में यहां के धरमपुर एवं कपराडा क्षेत्रों में कुंकणा, वारली, धोडिया, नायका आदि आदिवासियों द्वारा होली मनाने की परंपरा सदियों से जारी है।

यहां एक अजीब परंपरा यह भी है कि होली के दिन ही यहां के युवा जीवन-साथी का चुनाव भी कर लेते हैं।
होली मनाने का ये है अलग तरीका

– आदिवासी होली के त्योहार के दिनों में चिंता, दुःख, दर्द और दुश्मनी को भूलकर गीत गाते और नाचते हैं।
– होली पर गाए जाने वाले गीतों देवी का आह्वान किया जाता है।

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– होलिका दहन के दिन स्त्री-पुरूष एक-दूसरे की कमर में हाथ डाल कर गोलाकार घूमते हुए नाचते हुए गीत गाते हैं।
– गांव में होली छोटी और बड़ी के रूप में मनाई जाती है। छोटी और बड़ी-दोनों के स्थल अलग-अलग होते हैं।

– मान्यता है कि होली अगर जलते हुए पूरब दिशा में गिरती है तो सारा साल सुख-शांति से बीतेगा और वर्षा अच्छी होगी।
– कुछ दिन होली के दिन संकल्प लेते हैं। वह आम, करौंदे आदि को न खाने की प्रतिज्ञा लेते हैं और होली के दिन होली माता को पहले अपनी मनौती के अनुसार आम-करौंदे अर्पित करते हैं।
– होली के दिन स्त्रियां देर तक गीत गाती रहती हैं तो छोटे बच्चे खेल खेलते रहते हैं तो युवा लड़के-लड़कियां ढोल-नगाड़ों, तूर, तारपुं, कांहळी, पावी (बाँसुरी), मांदल, मंजीरा आदि के ताल पर उल्लास-उमंग में मुक्तता से नाचते-गाते रहते हैं।
– युवा इसी समय अपने जीवन-साथी का चुनाव भी कर लेते हैं।
– इस तरह पूर्णिमा का यह होलिकोत्सव फागुन के कृष्ण पक्ष की पंचमी तक मनाया जाता है।

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