मौका मिला है अब सैनिक बनने का अधूरा सपना पूरा करने का

-इंटरनेशनल नर्सेज डे पर विशेष : डॉक्‍टर के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले ‘शूरवीरों’ की कहानी

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी का दौर चल रहा है, सरकार ने लॉकडाउन कर रखा है। बेवजह घर से बाहर निकलने पर पाबन्दी है। वायरस की व्यापकता और प्रसार के तरीके से हर कोई दहशत में है। ऐसे में फ्रंट लाइन पर अदृश्‍य दुश्‍मन से लोहा लेने वाले कोरोना योद्धाओं में चिकित्‍सक के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वालों में नर्सिंग स्‍टाफ की भूमिका अहम् है।

इस समय जब आलम यह है कि संक्रमित मरीज पास तो छोड़ उसके घर से भी दूर रहने में लोग अपने को सुरक्षित समझते हैं, ऐसे में अस्पताल जहां पर कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज होता है और संक्रमण की पूर्ण संभावनाएं है, वहां पर नर्स की सेवा भावना की ताकत, उसके द्वारा ली गयी सेवा की शपथ निरंतर प्रेरित और हिम्‍मत देती रहती है। 12 मई को इंटरनेशनल नर्सेज डे है, इस मौके पर ‘सेहत टाइम्‍स’ ने कुछ ऐसे ही ‘सेवा दूतों’ से बात की।

हर मरीज को समझते हैं परिवार का सदस्‍य

जितेन्द्र उपाध्याय,  वार्ड मास्टर, कोरोना वार्ड इंचार्ज केजीएमयू

केजीएमयू में सबसे दहशत भरी ड्यूटी,  जहां पर कोरोना संक्रमित मरीजों के बीच में ही रहना होता है,  इतना ही नहीं,  सात दिन की ड्यूटी के बाद 14 दिन का एकांतवास भी मिलता है। इस कठिनाई पूर्ण कार्य को भी पूरे मन से हर मरीज को परिवार सदस्य समझकर सेवाएं मुहैय्या करा रहें हैं,  यही वजह है कि केजीएमयू में कोरोना मरीजों के ठीक होने की अवधि दर सबसे अधिक है,  दवाओं के अभाव में केजीएमयू की उक्त उपलब्धि में, इन्हीं कर्तव्यनिष्ठ और संवेदनशील स्वास्थ्य कर्मियों की ही भूमिका है।

365 दिन संक्रमण से लड़ते हैं ये नर्स दम्‍पति

सत्येंद्र कुमार और कल्पना वर्मा,  केजीएमयू

केजीएमयू का रेस्पेरेटरी मेडिसिन विभाग, जहां कोरोना काल में ही नहीं, टीबी जैसी गंभीर बीमारी फैलने की संभावना 24 घंटे 365 दिन बनी रहती है। वहां पर सत्येन्द्र कुमार कार्यरत हैं,  वर्ष 2008 से नर्सिंग सेवाओं में कदम रखने वाले सत्येन्द्र की कर्तव्यनिष्ठा ऐसी कि  इन्होंने मरीज व वार्ड के बाहर ध्यान ही नहीं दिया। यही वजह है कि 2011 से वार्ड में ड्यूटी की साथी कल्पना वर्मा को  अपना जीवन साथी बना लिया। जिससे इन दोनों का जीवन ही नर्सिंग सेवा को समर्पित हो चुका है। वर्तमान में दो बच्चों के साथ संक्रमण के दहशत भरे वार्ड में दोनों पूरी निष्ठा से निर्बल हो चुके मरीजों को अपनी सेवाओं से जीवन जीने की शक्ति दे रहें हैं।

कोरोना योद्धा के रूप में पूरा होता दिखा सैनिक बनने का अधूरा सपना

मन्‍ना मिश्रा,  वार्ड मास्‍टर गांधी वार्ड केजीएमयू

2011 में नर्सिंग सेवाओं में आये मन्‍ना मिश्रा इस समय केजीएमयू के गांधी वार्ड में कोरोना मरीजों का इलाज करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ डी हिमांशु के साथ ड्यूटी करते हैं। मन्‍ना मिश्रा बताते हैं कि उनकी इच्‍छा सेना में जाने की थी, लेकिन इनकी मां की इच्‍छा थी कि मैं मेडिकल क्षेत्र में जाऊं, मां की इच्‍छा का सम्‍मान करते हुए मैंने नर्सिंग सेवाओं को ज्‍वाइन किया। स्‍वाइन फ्लू वार्ड में ड्यूटी कर चुके मन्‍ना बताते हैं कि पिछले दिनों जब कोरोना वार्ड में ड्यूटी करने के लिए तैयार रहने का आदेश मिला तो लगा कि जैसे मेरी सैनिक बनने की इच्‍छा, कोरोना योद्धा बनकर पूरी हो रही है। मन्‍ना के घर में माता-पिता, बड़े भाई, पत्‍नी व दो बच्‍चे हैं, इनकी पत्‍नी ने भी नर्सिंग की ट्रेनिंग कर रखी है, लेकिन अभी कहीं काम नहीं कर रही हैं, लेकिन जज्‍बा ऐसा है कि अगर अभी कोरोना वार्ड में सेवा करने का मौका मिले तो सहर्ष तैयार हैं।

दुधमुंहे बच्‍चे से दूर रहकर सेवा कर रहीं क्‍वारंटाइन वार्ड में

संध्या वर्मा, क्वारंटाइन वार्ड केजीएमयू

वर्ष 2011 में नर्सिंग सेवाओं में आने वाली संध्या वर्मा की मेहनत का जवाब नहीं है, उनकी नर्सिंग सेवा से न केवल मरीज प्रसन्न हैं, बल्कि वार्ड के चिकित्सक भी कायल रहते हैं। यही वजह है कि कोरोना महामारी के दौर में, जब क्वारंटाइन लोगों के लिए,  दवा नहीं सहानुभूति और संवेदनाओं का अधिक मूल्य है वहां पर यह जिम्मेदारी, संध्या को सौपी गई है। कर्तव्यनिष्ठा ही है कि क्वारंटाइन लोगों के लिए एक वर्षीय बच्चे से दूर रहकर, सेवाएं दे रही हैं।

फीमेल नर्स के लिए चुनौती वाले कार्यों के पूरक बन गये मेल नर्स

सुशील सिंह, स्क्रीनिंग एरिया में वार्ड मास्टर केजीएमयू

आमतौर पर नर्स के रूप में महिलाओं की भूमिका अहम मानी जाती है, मगर वास्तव में मरीजों की सेवा और अस्पताल में तमाम कार्य होते हैं जो महिला नर्सेस को न केवल असहज करते हैं बल्कि नर्सिंग सेवाओं को पूर्णत: होने में अवरोधक थे। जिन्हें दूर किया, मेल नर्सेस ने। पुरुष नर्सेस की संख्या बढ़ने पर न केवल अस्पतालों में नर्सिंग सेवाओं को गति मिली, बल्कि मरीजों को अपेक्षाओं से अधिक नर्सिंग सेवाएं भी मिलनी शुरू हो गईं। अस्पताल में भी पुरुष नर्सेस के भरोसे तमाम ऐसे अछूते काम होने लगे, जिनके अभाव में सरकारी अस्पतालों को मुंह छिपाना पड़ता था। उसी क्रम में केजीएमयू में पुरुष नर्स सुशील सिंह हैं, जो केजीएमयू में आने वाले मरीजों की कोरोना स्क्रीनिंग में बतौर वार्ड मास्टर कार्यरत हैं, कोरोना टेस्ट रिपोर्ट आने तक मरीजों को भर्ती किया जाने वाले होल्डिंग एरिया में संदिग्ध मरीजों को पीपीई किट पहन कर नर्सिंग सेवाएं देने की जिम्मेदारी पूरी लगन से बिना भयभीत के निभा रहें हैं।

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