बगैर मांगे ही पेरोल पर जेलों से बाहर आयेंगे कैदी

प्रमुख संवादाता
भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में फैली महामारी कोरोना का जेलों में बंद कैदियों से सम्पर्क न हो जाये इसे लेकर सरकार और अदालत दोनों फिक्रमंद हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि जिन कैदियों को सात साल तक की सजा हुई है। उन कैदियों को पेरोल पर रिहा कर दिया जाना चाहिए।
इस कदम से ओवर क्राउडेड जेलों को काफी राहत मिलेगी। पिछले हफ्ते एक अन्य जज ने भी सरकार को यह राय दी थी कि जेलों में पिछले दस साल से बंद उन सभी विचाराधीन कैदियों को रिहा कर दिया जाना चाहिए जिनके अपराध की सजा दस साल से ज्यादा नहीं है।

देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस.ए.बोबड़े ने जेल अधिकारियों से पूछा है कि क्षमता से अधिक कैदियों का बोझ ढो रही जेलों में कोरोना से बचने के क्या इंतजाम हैं। उन्होंने जेल अधिकारियों से वह वैकल्पिक उपाय भी पूछे हैं जिनके ज़रिये कोरोना के संक्रमण से कैदियों को बचाया जा सके।

केरल की जेलों में कोरोना संक्रमण से संक्रमित कैदियों को अलग रखे जाने की व्यवस्था के बाद न्यायालय ने देश की सभी जेलों के प्रशासन से यह अपेक्षा की है कि वह अपनी-अपनी जेलों के हर कैदी पर नज़र रखें और न सिर्फ हर कैदी को कोरोना से सम्बंधित जानकारी दें बल्कि अगर कोई कैदी संक्रमित है तो उसके तत्काल इलाज की व्यवस्था भी करें।
उत्तर प्रदेश समेत देश की अधिकाँश जेलें क्षमता से अधिक कैदियों की वजह तमाम समस्याओं से जूझ रही हैं। अब कोरोना जैसी संक्रामक बीमारी आ गई है तो जेलों को लेकर चिंता का बढ़ जाना लाज़मी भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी जेलों में कैदियों से उनके परिजनों की मुलाक़ात पर 16 मार्च से रोक लगा रखी है। 31 मार्च तक यह रोक जारी रहेगी। पहली अप्रैल को जैसे हालात होंगे उसके अनुसार आगे का फैसला किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला इस वजह से लिया है कि मुलाकातियों के ज़रिये कोरोना वायरस का प्रवेश जेल के भीतर न होने पाए।
कैदियों के परिजनों को कैदी तक अगर कोई बहुत महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचानी है तो वह सम्बंधित जेल को फोन के ज़रिये बात कर सकते हैं। जेल प्रशासन इस सन्देश को कैदी तक पहुंचा देंगे।

जेल प्रशासन के सामने दो तरह की दिक्कतें हैं। पहली दिक्कत तो जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदियों का होना है। कम जेल स्टाफ के ज़रिये ज्यादा संख्या में कैदियों का प्रबंधन संभालना और दूसरी दिक्कत अधिकाँश कैदियों का कम पढ़ा लिखा होना या फिर अनपढ़ होना है। कोरोना जैसी संक्रामक बीमारी के सम्बन्ध में अनपढ़ कैदियों को समझा पाना जेल प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर है।

यही वजह है कि बहुत सी जेलों में पढ़े-लिखे कैदियों को यह ज़िम्मा सौंपा गया है कि वह अनपढ़ कैदियों को कोरोना के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी दें और उन्हें सैनेटाइज़र और साबुन के महत्व के बारे में जानकारी दें ताकि जेलों को संक्रमण से बचाया जा सके।

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