फर्क बापू की नशाबंदी और सिद्धू के नशाबंदी नुस्खे का !

अजीब संयोग है कि बापू ने देश को नशाबंदी से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया, उन्हीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की डेढ़ सौ वीं जयंती पर पंजाब के मंत्री और पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू ने प्रदेश में अफीम की खेती को कानूनी बना देने का सुझाव दिया है। इस बिना पर कि राज्य में हेरोइन जैसे खतरनाक नशे की गिरफ्त में बर्बाद पीढ़ी को बचाया जा सके। लेकिन यह मुद्दा केवल सियासी सुट्टे लगाने का नहीं है। कुछ दिन पहले पंजाब से एक नवविवाहिता द्वारा दुल्हन के जोड़े में ‘चिट्टे’ का नशा करते हुए तस्वीर वायरल हुई थी, जिसने पूरे देश को चौंका दिया था। बेहद खतरनाक हेरोइन ड्रग के लिए पंजाब में ‘चिट्टा’ शब्द चलता है। सिद्धू का मानना है कि हेरोइन से युवाअों को विरक्त करने के लिए अफीम को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह तुलनात्मक रूप से कम खतरनाक नशा है। हालांकि यह सुझाव किसी को बंदूक की गोली के बजाए भांग की गोली से मारने जैसा है। लेकिन यह भी सचाई है कि पंजाब में नशे का रोग हद से आगे निकल चुका है। वर्ष 2015 में किए गए पंजाब अोपियाॅइड डिपेंडेंट सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 2 लाख 32 हजार से ज्यादा लोग नशे की चपेट में थे। राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हैं। नशे के चलते पंजाब की पूरी युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है। अभिभावक समझ नहीं पा रहे हैं कि वे क्या करें। यह भी कहा जाता है कि पंजाब से खालिस्तानी आतंकवाद की कमर तो टूट गई, लेकिन जाते-जाते वह राज्य को ‘नशे का आंतक’ तोहफे में दे गया।
हैरानी की बात यह है कि पंजाब में बहुसंख्यक आबादी सिखों की है और सिख धर्म में सभी तरह का नशा पूरी तरह प्रतिबंधित है। केवल सिखों का एक सम्प्रदाय निहंग, जिन पर गुरूद्वारों की रक्षा का दायित्व रहता है, भांग का नशा करते हैं। इसके पक्ष में यह तर्क ‍है कि वे ‘ध्यान’ लगाने के लिए ऐसा करते हैं। हालांकि सिखों की सर्वोच्च संस्था ने इस पर भी रोक लगा दी है। लेकिन यह पूरे तौर पर नहीं रूका है। उधर हिंदुअों में गांजा भांग को भगवान शिव का प्रसाद’ माना जाता है। लेकिन हेरोइन का नशा इन सबसे ज्यादा खतरनाक है। हेरोइन अफीम के डोडे से निकले माॅर्फीन से बनाई जाती है। इसकी लत लग जाने के बाद आदमी कहीं का नहीं रहता। यूं अफीम की खेती मप्र सहित देश के कई हिस्सो में सरकारी नियं‍त्रण में होती है, लेकिन नशे की लत वहां भी ऐसी नहीं है, जैसी कि आज सीमावर्ती राज्य पंजाब में है। इसका मुख्य कारण हेरोइन और अन्य नशीले पदार्थों की पाकिस्तान से होने वाली तस्करी है। यह हेरोइन अफगानिस्तान से व्हाया पाकिस्तान होते हुए पंजाब पहुंचती है। पंजाब पहुंचते-पहुंचते इसकी कीमत गई गुना बढ़ जाती है। भारत में यह चोरी छिपे 40 हजार रू. तोला तक के भाव में बिकती है। यानी सोने से भी ज्यादा महंगी। हेरोइन के लतियल इसे किसी भी भाव लेने के लिए मजबूर रहते हैं।
पंजाब में नशे के बेधड़क कारोबार के लिए कई लोग पूर्व की अकाली-भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। वहां लोगों ने पूर्व मुख्यकमंत्री प्रकाशसिंह बादल को ‘चिट्टा रावण’ तक की संज्ञा दे डाली थी। पिछले विधानसभा चुनाव में नशा राज्य का मुख्य चुनावी मुद्दा था। उस स्थिति में अभी भी ज्यादा फरक नहीं पड़ा है। हालांकि राज्य की अमरिंदर सरकार ने सरकारी कर्मचारियों का डोप टेस्ट अनिवार्य कर ‍िदया है।
वहां मुख्यं चिंता यह है कि नशे के कारोबार पर लगाम कैसे लगाई जाए और नशे के गुलाम हो चुके युवाअों को इस नरक से कैसे बाहर निकाला जाए। वैसे सिद्धू ने जो मुद्दा उठाया है, वह कोई नया नहीं है। क्योंकि राज्य से आम आदमी पार्टी के निलंबित सांसद डाॅ धर्मवीर गांधी इसे पहले से उठा रहे हैं। उनकी यही मांग है कि पंजाब में अफीम की खेती को वैध ‍िकया जाए ताकि युवा हेरोइन के जानलेवा दुष्चक्र से बाहर आ सकें। सिद्धू ने कहा ‍िक मेरे चाचा दवाई के रूप में अफीम का सेवन करते थे। उन्होने यह आरोप भी लगाया कि राज्य में हेरोइन का चलन अकाली नेता व पूर्व उप मु्ख्यमंत्री सुखबीर बादल के साले विक्रम सिंह मजीठिया के कारण बढ़ा है। सिद्धू की बात का समर्थन करते हुए राज्य के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि मैं यह मुद्दा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के समक्ष उठा चुका हूं। मैं कह चुका हूं कि भारत की एक ड्रग पॉलिसी होनी चाहिए। ऐसे मादक पदार्थों पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक कठोर नीति होनी चाहिए। उम्मीद करता हूं कि इसे गंभीरता से देखा जाएगा और सभी के हित में इसका समाधान किया जाएगा।’
यह बात चूंकि सिद्धू ने कही है, इसलिए उस पर राजनीतिक बवाल मचना स्वाभाविक है। कहा जा रहा है कि सिद्धू अफीम के नशे को जायज ठहराकर संदेश क्या देना चाह रहे हैं? यह तो खाई से निकल कुएं में छलांग लगाने जैसा है। वे युवाअों को नशे के जाल से बाहर निकालना चाहते हैं कि उसमें डुबोना चाहते हैं? वैसे यह बात सही है कि पंजाब में अफीम का नशा भी काफी लोग करते हैं। यह उन्हें महंगे दामों में खरीदनी पड़ती है। अफीम खेती समर्थकों का तर्क है कि अगर इसकी पैदावार पंजाब में ही होने लगेगी तो इसकी तस्करी भी रूकेगी और हेरोइन के नशेड़ी अपेक्षाकृत कम नुकसान देह अफीम के नशे की अोर प्रवृत्त होंगे। कई लोग सिद्धू के इस सुझाव को महज राजनीतिक शोशेबाजी भी मान सकते हैं, क्योंकि यह एक नशे को कम करने के लिए दूसरा नशा करने को जायज ठहराने जैसा है। यानी ब्रांडी की जगह डाॅक्टर्स ब्रांडी पीने की नेक सलाह। अफीम की खेती को वैध बनाने पर राज्य में नशे का धंधा और बढ़ने का खतरा भी है, क्योंकि पंजाब में नशे की लत केवल सम्पन्नता, बढ़ती बेरोजगारी अथवा व्यक्तिगत कुंठा या डिप्रेशन के कारण ही नहीं है। वह एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का भी हिस्सा है। अफीम की खेती इस दुष्चक्र को तोड़ने में कितनी मददगार होगी, कहना मुश्किल है। हमारे देश में जब नशाबंदी की बात होती है तो आशय अमूमन शराबबंदी से होता है। महात्मा गांधी ने भी अपने समाज सुधार आंदोलन में मुख्यगत: शराब से दूर रहने की बात कही थी। लेकिन तब से अब तक समाज नशे की गर्त में और गहरे चला गया है। शराबबंदी तो अब राजनीतिक शिगूफेबाजी बन गई है। लेकिन पंजाब नशे की दुनिया में ‍िजस मुकाम पर पहुंच गया है, वहां शराब से ज्यादा हेरोइन की बाढ़ को रोकने की चिंता है। लिहाजा ‘सिद्धूइज्म’ को मजाक से हटकर सिद्धू के सुझाव पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, भले ही इसमें दूसरे खतरे निहित हों।
अजय बोकिल

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