प्रियंका गांधी के सामने यूपी में कमजोर कांग्रेस को साधना बड़ी चुनौती

प्रियंका गांधी वाड्रा को राष्ट्रीय महासचिव के साथ ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पूर्वी क्षेत्र का प्रभारी बनाए जाने के बाद से ही प्रदेश ही नहीं देश भर के कांग्रेसी बेहद उत्साहित हैं। कांग्रेसी भले ही उत्साहित हों, लेकिन प्रियंका को यह कांटों भरा ताज मिला है।प्रियंका गांधी के सामने यूपी में कमजोर कांग्रेस को साधना बड़ी चुनौती

प्रदेश में 29 वर्ष से सियासी वनवास भोग रही कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराने को प्रियंका गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यहां गुटबाजी में उलझे कमजोर संगठन को साधना होगी। यहां पर निचले स्तर पर निष्क्रिय व पस्त कार्यकर्ताओं को तुरन्त चुनावी मोड में लाना आसान नहीं होगा। असल मुश्किल सभी 80 सीटों पर चुनाव लडऩे के लिए दमदार प्रत्याशियों की तलाश भी है। पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बाद से संगठन की स्थिति और अधिक दयनीय हो चुकी है।

इतना ही संगठन की दशा सुधारने के लिए शीर्ष स्तर से कोई गंभीर प्रयास भी नहीं किया गया है। यहां सितंबर 2017 में संगठनात्मक चुनाव कराने के बाद अब तक निर्वाचित ब्लाक व जिला-शहर अध्यक्षों की घोषणा भी न हो सकी। इसके कारण इस दौरान बहुत से पदाधिकारी पार्टी छोड़कर अन्य दलों में चले गए और जिनमें से कई ने वापस लौट कर खुद को अध्यक्ष बताना शुरू कर दिया है। अराजकता की स्थिति इतनी है कि करीब एक दर्जन स्थानों पर एक से अधिक अध्यक्ष कार्यरत हैं।

एक पूर्व प्रदेश महामंत्री का कहना है कि गत दो वर्ष में जिला और मंडल कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित करने की दो बार घोषणा की गयी परंतु दो-तीन सम्मेलनों से आगे बात न बढ़ सकी। प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने भले ही कुछ सक्रियता दिखायी परंतु प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव गुलाम नबी आजाद मुख्यालय आने से भी बचते रहें। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. निर्मल खत्री व तत्कालीन प्रभारी मधु सूदन मिस्त्री द्वारा ब्लाक व बूथ स्तर पर तैयार किया संगठन भी सुस्त हो गया है।

पद बांटने तक सीमित है फ्रंटल संगठन और विभाग

प्रदेश कांग्रेस में मुख्य संगठन के साथ ही फ्रंटल और विभागों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। यहां युवक कांग्रेस और एनएसयूआई जैसे संगठनों में पदाधिकारियों की नियुक्ति बैलेट से कराने से पार्टी की ओर युवाओं का आकर्षण कम हुआ। युवक कांग्रेस व एनएसयूआई के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष का कहना है कि संगठन का पुराने र्ढे से गठन शुरू नहीं किया तो हालात सुधरना मुश्किल है।

पिछड़ा वर्ग विभाग के जिलाध्यक्ष 15 दिन में तैनात होंगे

संगठन तैयार करने की पहल करते हुए पिछड़ा वर्ग विभाग द्वारा मंडल को-आर्डिनेटरों की बैठक में 15 दिन के भीतर जिला-शहर व ब्लाक अध्यक्षों की नियुक्ति करने का फैसला लिया गया।

किसान व अल्पसंख्यक जैसे विभागों को प्रदेश अध्यक्षों की तलाश

संगठन के प्रति नेतृत्व की उदासीनता के चलते ही किसान विभाग में छह वर्ष से प्रदेश अध्यक्ष तैनात नहीं हो सका जबकि कांग्रेस किसानों को फोकस में रखकर ही लोकसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। वहीं, अल्पसंख्यक विभाग में हाजी सिराज मेंहदी के त्यागपत्र के छह माह बाद भी प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त नहीं किया जा सका है।

प्रदेश अध्यक्ष के कक्ष में बैठाने की तैयारी

कांग्रेस दफ्तर में नवनियुक्त राष्ट्रीय महासचिव व पूर्वी जिलों की प्रभारी प्रियंका गांधी के स्वागत की तैयारियां तेज हो गयी है। प्रियंका गांधी यहां पर प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर के नए कक्ष में बैठ संगठनात्मक गतिविधियों की निगरानी करेगी। प्रथम तल स्थित अत्याधुनिक साज सज्जा वाले कक्ष में सफाई आदि कार्य नए सिरे से कराया जा रहा है। प्रियंका चार फरवरी को कार्यभार ग्रहण करने आ सकती है। प्रियंका के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी होंगे। अभी प्रियंका गांधी का औपचारिक कार्यक्रम जारी नहीं हुआ है परंतु कार्यालय में स्वागत की तैयारी शुरू हो चुकी है। उनके के लिए जिस कक्ष को सुसज्जित किया जाएगा उसको सुरक्षा की दृष्टि से भी उपयुक्त माना जा रहा है। इसके लिए अलग से ऊपर जाने का जीना भी उपलब्ध है। कक्ष का निर्माण वास्तुविदें की सलाह पर कराया गया है।

कांग्रेस के प्रियंका कार्ड से पशोपेश में रालोद

कांग्रेस के प्रियंका गांधी कार्ड ने राष्ट्रीय को भी पेशोपेश में डाल दिया। खासकर रालोद के भीतर सपा- बसपा गठबंधन में सम्मानजनक सीटें नहीं मिलने से बढ़े असंतोष के चलते एक खेमा कांग्रेस से गठबंधन करने की पैरोकारी में जुटा है। अन्य छोटे दलों में भी कमोबेश ऐसे ही हालात है। गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस रालोद मिलकर चुनाव लड़े थे और गठबंधन में सीट बंटवारे में रालोद के हिस्से में आठ सीटें आयी थी। मोदी लहर के चलते रालोद बागपत व मथुरा जैसे गढ़ को भी गवां बैठी थी। एक पूर्व महामंत्री का कहना है कि सपा- बसपा गठबंधन में मात्र दो-तीन सीट पर सिमट जाने के बजाए कांग्रेस जैसे दल से मिल अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा जाए तो संगठन में मजबूती जाएगी।

कांग्रेस से गठबंधन के पैरोकार रालोद नेताओं का कहना है कि प्रियंका-कार्ड से गैरभाजपावाद की सियासत का केंद्र आने वाले दिनों में कांग्रेस बनेगी। इसी लिए कांग्रेस से दोस्ती रालोद के लिए फायदे का सौदा सिद्ध होगा। यूं भी गत विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जिस तरह रालोद को किनारे किया था। उससे भी सबक लिया जाना चाहिए। सूत्रों का कहना है कि सपा बसपा से गठबंधन में रालोद कम से कम चार सीट मांगने पर अड़ा है परंतु तीन से अधिक सीटें नहीं मिल पा रही है। दो सीटों बागपत और मुजफ्फरनगर क्रमश: जयंत चौधरी एवं अजित सिंह का लडऩा तय है तो केवल एक सीट पर पार्टी में कितनों को संतुष्ट किया जा सकेगा। 

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