प्रवासी श्रमिकों ने संभालीं गंडक, गंगा और बलान से बचाने की जिम्मेदारी

बेगूसराय, 30 जुलाई। वैश्विक महामारी कोरोना की मार से पूरी दुनिया में तबाही मची हुई है, हर जगह भागम-भाग की हालत है‌। देश के विभिन्न शहरों से अभी भी प्रवासी लौट कर घर आ रहे हैं। जिसमें से कुछ श्रमिक यहां काम नहीं मिलने पर लौट कर फिर से परदेस भी जा रहे हैं, लेकिन अधिकांश श्रमिक अब यहीं रहने के मूड में दिख रहे हैं। कोई स्वरोजगार के लिए प्रयास कर रहा है तो कोई सरकार के महत्वाकांक्षी जल जीवन हरियाली अभियान समेत अन्य योजनाओं को सफल बनाने में लगे हुए हैं। परदेस से घर लौट कर आए श्रमिक कोई भी काम करने में पीछे नहीं हट रहे हैं।

गंगा, बूढ़ी गंडक और बलान जैसी नदियां जब उफान पर हैं तो प्रवासी श्रमिक अपने श्रमशक्ति से उनकी धारा को काबू करने में लग गए हैं। बूढ़ी गंडक में एक दर्जन से अधिक जगहों पर कटाव और रिसाव निरोधक कार्य हो रहे हैं। जिसमें बड़ी संख्या में परदेस से लौटे श्रमिकों को काम मिला है। इन्हें किसी नदी की जलधारा मोड़ने का अनुभव नहीं हैं, लेकिन बुजुर्ग श्रमिकों के अनुभव तथा जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के निर्देशन में यह पानी के दबाव वाले जगहों पर डटे हुए हैं। परदेस में विभिन्न कार्यों में लगे रहने वाले श्रमिक अब प्लास्टिक और लोहा के जाल में बालू भरा बोरा पैकिंग कर नदी में डाल रहे हैं, ताकि बड़ी आबादी को निगलने को बेताब बूढ़ी गंडक के पानी का दबाव तटबंधों (बांध) पर कम हो सके।

बांध में चूहा, खिखिर, साही आदि विभिन्न जीव-जंतुओं द्वारा बनाए गए बिल से पानी का रिसाव रोकने के लिए यह लोग नदी के पानी में उतर कर काम कर रहे हैं। बूढ़ी गंडक ही नहीं, गंगा के अथाह जल से हो रहे कटाव स्थल पर भी विभिन्न सुरक्षात्मक कार्य में लगे हुए हैं। बूढ़ी गंडक नदी के बसही, सकरौली, रामपुर और पवड़ा में कटाव निरोधक कार्य कर रहे रमेश सहनी, विनोद सहनी, गोरख महतों, कमल देव महतों, लालो महतों आदि ने बताया कि हम लोग वर्षों से परदेस में दैनिक मजदूरी कर अपना जीवन गुजार रहे थे। लॉकडाउन के बाद काम बंद हो गया तो किसी तरह गांव आ गए, यहीं रहकर रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे थे। इसी दौरान जब नदी का जलस्तर काफी बढ़ने लगा और कटाव तथा रिसाव होने लगा तो निरोधात्मक काम के लिए अचानक से ठेकेदार को मजदूरों की जरूरत हुई जिसके बाद हम लोगों ने इस नए काम को करने का बीड़ा उठाया तथा तन-मन से दिन रात एक कर लोगों को बाढ़ का कहर झेलने से बचाने में लगे हुए हैं।

इन लोगों ने बताया कि हमने अपने श्रमशक्ति से नदी के कई दबाव वाले स्थलों को काबू में किया है। प्रकृति के आगे कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन प्रकृति ने ही हम लोगों को गांव आने के लिए मजबूर किया और अब उसी प्रकृति ने उफनाते नदी के कहर से लोगों को बचाने का जिम्मा दिया है, जिस में लगे हुए हैं। यह काम जितना दिन चल रहा है ठीक है, उसके बाद फिर कोई काम करेंगे, केंद्र सरकार मनरेगा भी चला रही है, गरीब कल्याण रोजगार अभियान भी शुरू किया गया है। सुनने में आया है कि सरकार हम लोगों को आत्मनिर्भरता के उद्देश्य से स्वरोजगार के लिए छोटे-छोटे कर्ज भी दे रही है, उद्योग धंधे लगाए जा रहे हैं तो कहीं ना कहीं काम मिलेगा ही।

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