पाकिस्तान में जन्मे श्रवण ने भारत आकर ऐसे जमाया कारोबार, बिना डिग्री के सालाना कमा रहे अरबों

 मेहनत और लगन से हर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। बाड़मेर, राजस्थान के श्रवण कुमार माहेश्वरी ने एक ऐसी ही मिसाल कायम की है, जो सीमाओं से परे है। वे पाकिस्तान के सिंध प्रांत में जन्मे और फिर साल 1972 में कम पैसे और बिना किसी फॉर्मल डिग्री के भारत आ गए। आज उनके भारत आने के कई दशक बाद, वह एक ऐसी कंपनी के मालिक हैं जिसका सालाना टर्नओवर 250 करोड़ रुपये है। वे अपने प्रोडक्ट्स 50 देशों में एक्सपोर्ट करते हैं।

खोल ली किराने की दुकान

श्रवण ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की और 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद परिवार समेत भारत आ गए। यहां आकर वे बाड़मेर में बस गए और स्टेशन रोड पर एक छोटी किराने की दुकान शुरू की। इस दुकान पर वे विभिन्न तरह का सामान बेचते। मगर उनकी खास पहचान बनी अपनी कड़ी मेहनत और ईमानदारी से। वे इसी से पहचाने जाने लगे।

सन 1980 में बदली किस्मत

श्रवण की किस्मत बदली सन 1980 में, जब उन्होंने ग्वार गम इंडस्ट्री में एंट्री की। श्रवण ने महेश एग्रो फूड इंडस्ट्रीज (Mahesh Agro Food Industries) नाम से कंपनी शुरू की। ग्वार गम का इस्तेमाल खाने, दवा, कॉस्मेटिक्स और तेल इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर होता है। ये उनके लिए एक कदम साबित हुआ।
शुरुआत में श्रवण को मार्केट की जानकारी न होने के कारण मुश्किलें आईं। मगर मार्केट की समझ और क्वालिटी के प्रति कमिटमेंट की वजह से उन्हें कामयाबी मिली।

विदेश जाने लगे प्रोडक्ट्स

घरेलू स्तर पर कामयाबी के बाद श्रवण के प्रोडक्ट्स जर्मनी, अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और जापान समेत 50 देशों तक पहुँचने लगे। उनका सालाना टर्नओवर 250 करोड़ रुपये है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अपने सफर के बारे में बताते हुए, श्रवण कुमार ने कहा, “कड़ी मेहनत और कॉन्फिडेंस मेरी सबसे बड़ी खूबी थे।”
उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने कभी भी डिग्री की कमी को रुकावट नहीं माना, बल्कि उन्होंने मार्केट की डिमांड, मॉडर्न टेक्नोलॉजी और अपनी फैक्ट्री में ऑटोमैटिक प्लांट लगाने पर फोकस किया।

कई लोगों को दिया रोजगार

आज श्रवण ने सैकड़ों लोगों को रोजगार दिया हुआ है। इनमें किसान, मजदूर, इंजीनियर और मार्केटिंग स्टाफ शामिल हैं। उनके बिजनेस मॉडल में लोकल किसानों से ग्वार खरीदना शामिल है, जिससे लोकल इकोनॉमी को बढ़ावा मिलता है।

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