ना है कोई पुख्ता प्रबंध, लोग एमरजेंसी ब्रेक को खींचकर रोकते है गाड़ी : कांगड़ा घाटी

कांगड़ा घाटी की रेल का सुहावना सफर सुरक्षित नही हैं। पठानकोट से जोगेंद्रनगर चलने वाली कांगड़ा घाटी ट्रेन में न तो आग से लड़ने के कोई उपकरण होते हैं और न ही डिब्बों की जांच का कोई प्रबंध। पठानकोट से जोगेंद्रनगर लगभग 160 किलोमीटर लंबे इस रेल ट्रेक को हैरिटेज माना गया है। इस ट्रैक पर रोजाना 12 गाड़िया पठानकोट से बैजनाथ तक आती जाती हैं। जबकि जोगेंद्रनगर को अलग से ट्रेन भेजी है।

पठानकोट से आने वाली ट्रेन में सात डिब्बे होते हैं, लेकिन इनमें से किसी में भी आग से बचाव का कोई उपकरण नहीं होता है, न ही डिब्बों की जांच की व्यवस्था रेलवे स्टेशनों पर की गई है, ताकि यह देखा जा सके कि कहीं कोई ज्वलनशील पदार्थ तो लेकर गाड़ी में नहीं जा रहा है। बचाव के नाम पर केवल श्लोगन लिखकर रेलवे विभाग ने इतिश्री की है। विभाग के अधिकारियों की माने तो इंजन के चालक और स्टाफ के पास अग्निशमन उपकरण होते हैें लेकिन अगर आग कहीं लगती है तो इसकी सूचना चालक को किस तरह से लोग देंगे इस बारे भी कोई पुख्ता प्रबंध नहीं है, केवल एमरजेंसी ब्रेक को ही खींचकर लोग गाड़ी रोक सकेंगे।
यहां ये बात दें कि कांगड़ा घाटी में प्रवेश करने पर अधितकर ट्रैक का भाग जंगल से होकर गुजरता है। ऐसे में अगर कोई घटना होती है तो यह जानलेवा साबित हो सकती है। हालांकि पालमपुर में रेलवे पुलिस का कार्यालय तो है लेकिन वहां भी एक दो-तीन कर्मचारियों के हवाले ही पूरी व्यवस्था विभाग ने कर रखी है। बॉक्स अवैध रेलवे क्रॉसिंग भी परेशानी सुरक्षा की दृष्टि से अवैध रेलवे क्रॉसिंग बड़ी समस्या बनी हुई है। यहां पर सुपर फास्ट ट्रेन चलाने का प्रस्ताव भी इसी कारण अधर में लटक गया है। कई जगह पर रेल की गति धीमी करनी पड़ती है। ऐसे में कोई चलती ट्रेन में चढ़कर वारदात को अंजाम दे दे तो इस बात से इंकार नही किया जा सकता।
यह रेल ट्रैक वर्ष 1929 में बना था। इसमें मुख्य स्टेशनों में, नूरपुर, ज्वालामुखी रोड़, कांगड़ा, नगरोटा बगवां, पालमपुर, बैजनाथ,जोगेंद्रनगर शामिल हैं।
रेलगाड़ी के इंजन में मौजूद चालक व स्टाफ के बाद अग्निशमन यंत्र होते हैं। इसके अलावा ट्रैक की जांच भी की जाती है और रेलवे पुलिस भी मुस्तैद रहती है। हरीश कटोच, एसडीओ रेलवे विभाग।





