दिल्ली में 1047 जल निकायों के बावजूद नमभूमियां संकट में, 30 साल में 9 प्रतिशत हिस्सा खत्म

दिल्ली में कई जल निकाय और नमभूमियां मौजूद हैं, लेकिन किसी को भी रामसर सूची में शामिल नहीं किया है।
राजधानी की नमभूमियों की स्थिति चिंताजनक बनी है। दिल्ली में कई जल निकाय और नमभूमियां मौजूद हैं, लेकिन किसी को भी रामसर सूची में शामिल नहीं किया है।

कानूनी संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय मान्यता की कमी इन महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्रों की सुरक्षा में बड़ी बाधा बन रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, तेजी से बढ़ता शहरीकरण, निर्माण और प्रदूषण इन जल निकायों और नमभूमियों को खतरे में डाल रही है। हाल के अध्ययन और रिसर्च से पता चलता है कि पिछले कई साल में इन जल निकायों और नमभूमियों का क्षेत्र लगातार घटा है। इसके कारण जैव विविधता और पानी के प्राकृतिक संसाधनों पर गंभीर असर पड़ रहा है।

दिल्ली में नमभूमियों की कुल संख्या भले ही हजारों में हो, लेकिन कानूनी संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय मान्यता की कमी इनकी सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि बीते 30 वर्षों में दिल्ली की नमभूमि का लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा खत्म हो गया, जबकि दक्षिणी दिल्ली में यह गिरावट 97 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह अध्ययन एचसीएल टेक और टेरना ग्लोबल बिजनेस स्कूल के सहयोग से किया गया। इसमें 1991 से 2021 तक के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिससे राजधानी के जल निकायों और हरित क्षेत्रों में आई गिरावट का पता चला। अध्ययन के अनुसार, दिल्ली में नमभूमि क्षेत्र 2000 में 32.9 वर्ग किमी से घटकर 2022 में 30.2 वर्ग किमी रह गया।

नजफगढ़ झील और संजय झील सिकुड़ीं
एक अध्ययन के अनुसार, नजफगढ़ झील, भलस्वा झील और हौज खास जैसी प्रमुख नमभूमियां तेजी से सिमट रही हैं। संजय झील अब चारों ओर से निर्माणों में घिर गई है। हालांकि, नई दिल्ली क्षेत्र में जल आवरण थोड़ा बढ़ा है। इसमें 2011 के 0.012 से 2021 में 0.49 फीसदी, जो नियोजित पुनर्स्थापन परियोजनाओं का परिणाम है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की आबादी 1951 में 14.7 लाख से बढ़कर 2023 में करीब 3.3 करोड़ हो गई है। इसी दौरान शहर का क्षेत्रफल 201 वर्ग किमी से बढ़कर 1,467 वर्ग किमी तक फैल गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तेज विस्तार ने प्राकृतिक जल प्रणालियों पर भारी दबाव डाला है, जिससे यमुना नदी और उसके बाढ़ मैदान भी संकुचित हो गए हैं।

यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क उम्मीद की किरण
इन चुनौतियों के बीच यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क उम्मीद की किरण बना हुआ है। दिल्ली विकास प्राधिकरण और दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल मैनेजमेंट ऑफ डिग्रेडेड इकोसिस्टम्स की तरफ से विकसित यह पार्क यमुना नदी के बाढ़ का मैदान को पुनर्स्थापित करने का सफल उदाहरण है। पार्क में प्राकृतिक आर्द्रभूमियां, घास के मैदान, वन क्षेत्र और नदी तटवर्ती पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल किया गया है। यह भूजल रिचार्ज, बाढ़ नियंत्रण, वायु और जल गुणवत्ता सुधार और जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यहां सैकड़ों स्थानीय पौधे, पक्षी, कीड़े, सरीसृप और स्तनधारी संरक्षित हैं। पार्क पर्यावरण शिक्षा, अनुसंधान और जनता में जागरूकता फैलाने का भी केंद्र है।

इसलिए जरूरी है नमभूमि
यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क के नमभूमि प्रदूषित पानी से गाद और हानिकारक पदार्थ हटाते हैं और भूजल को भरते हैं
नमभूमियां अतिरिक्त पानी को रोकती हैं और धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिससे मानसून में बाढ़ की समस्या कम होती है
ये जगहें प्रवासी और स्थानीय पक्षियों के लिए सुरक्षित विश्राम और प्रजनन स्थल हैं। यमुना पार्क में 70 से अधिक पानी पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं
नमभूमि शहर को ठंडक देते हैं, कार्बन सोखते हैं और वायु की गुणवत्ता सुधारते हैं
लोग वॉकिंग, बर्ड वॉचिंग और रिसर्च के लिए इन पार्कों का इस्तेमाल करते हैं
मत्स्य पालन, पर्यटन और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराते हैं

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