ट्रैफिक वीक के दौरान नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अभियान…

 ऊधमपुर के बाड़ेयां इलाके में तेज रफ्तार मिनीबस के सवारियों को उठाने के चक्कर में हुए दर्दनाक हादसे से साफ हो गया है कि चालक ट्रैफिक नियमों को ठेंगा दिखा कर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। बेशक शहरों में नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, लेकिन शहरों के आसपास लगते इलाकों में नियम फेल है। चालक अपने आगे चल रही बसों से आगे निकलने की होड़ में यात्रियों की जान खतरे में डाल रहे हैं।

नियमों से बेखौफ कमर्शियल वाहन चालकों को लगता है कि मानो उन्हें मासूमों की जिंदगी से खेलने का लाइसेंस मिल गया हो। ट्रैफिक विभाग ने हाल ही में वाहनों की गति नापने के लिए आठ स्पीड रेडार मीटर खरीदे हैं, जिससे चालकों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। विभाग को चाहिए कि मीटरों का इस्तेमाल शहरों के बजाए बाहरी इलाकों में भी करें। कुछ दुर्घटनाएं वाहनों में तकनीकी खराबी से होती हैं, लेकिन अधिकतर हादसे मानवीय चूक से हो रहे हैं। इसके लिए काफी हद तक ट्रैफिक पुलिस भी जिम्मेदार है। बेशक ट्रैफिक वीक के दौरान नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अभियान चला कर लोगों को नियमों का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन शहर और उसके बाहरी इलाकों में ट्रैफिक निजाम पटरी पर नहीं आया है।

शहर से निकलते ही मिनी बसों में ओवरलोडिंग बढ़ जाती है, जिससे दुर्घटनाओं में वृद्धि हो रही है। विभाग को चाहिए कि बाहरी इलाकों में भी अनियंत्रित ट्रैफिक व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कर्मियों को तैनात करे। जहां तक संभव हो अदालत के उस आदेश को भी लागू करें, जिसमें दो से अधिक दुर्घटनाओं के दोषी ड्राइवरों के लाइसेंस रद करने का प्रावधान है।

इंसानी जान की कीमत मात्र पांच से दस रूपये

ऊधमपुर में मेटाडोर हादसे ने चालकों की लापरवाही दर्शा दी कि उनके लिए अनमोल इंसानी जानों की कीमत 5-10 रुपये से ज्यादा नहीं है। दुर्घटना स्थल पर लगे विभिन्न सीसीटीवी में न केवल हादसे का खौफनाक मंजर कैद हुआ है, बल्कि इसकी वजह बनी दो मेटाडोरों के बीच आगे निकलने की होड़। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो को देख कर हादसे की असली वजह भी कैद हो गई, जिसे लोग ऊधमपुर की सड़कों पर आंखों से अक्सर देखते हैं। विभाग कार्रवाई तो करता है, मगर ज्यादा सख्त न होने की वजह से असर नहीं होता, जिस वजह से लोगों की मौत बन कर दौड़ती मेटाडोरों पर अंकुश नहीं लगता।

बेटी को जम्मू रूखस्त करना था, खुद दुनिया से विदा हो गए

मौत की जगह और वक्त पहले ही मुकरर होता है। बाड़ेयां पीएचई स्टेशन के पास तीन लोगों की जिंदगियों के चिराग पलभर में बुझा देने वाले हादसे ने बता दिया कि काल किसी भी रूप में और कहीं से भी आ सकता है। हादसे में मारे गए तीन लोगों में शामिल भूषण कुमार ने सपने में भी नहीं सोचा था कि घर से चंद कदम के फासले पर काल से सामना हो जाएगा। उन्हें या उनके परिवार को तो ईल्म भी नहीं था कि बेटी को जम्मू रुखस्त करने के लिए बस में चढ़ाने से पहले खुद ही दुनियां से रुखस्त हो जाएंगे। इस हादसे से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। बाडयां में रहने वाले भूषण कुमार की छोटी बेटी सिमरन शर्मा जम्मू में पढ़ाई कर रही है। अवकाश के चलते वह घर आई थी।

बुधवार को उसे वापस जम्मू जाना था। घर से कुछ दूरी पर बाहर धार रोड पर सिमरन को चढ़ाने के लिए उसके पिता भूषण कुमार, मां तृप्ता रानी और भाभी बिंदिया देवी भी आए थे। वह अक्सर रामनगर से जम्मू जाने वाली इसी बस से जाती थी, क्योंकि वह घर के पास ही मिल जाती थी। बस को आने में कुछ समय था, इसलिए धार रोड पार कर दूसरे छोर पर नहीं गए। सुरक्षा के लिए वह सड़क से काफी पीछे खड़े थे। वहां पर सड़क किनारे खंभों पर ट्रांसफार्मर भी लगा था। सभी उस जगह पर खड़े होकर बातें कर रहे थे।

इस बीच सुबह 7 बजकर 44 मिनट पर पीएचई स्टेशन की तरफ से मेटाडोर काल बन कर उनकी तरफ बढ़ने लगी। हादसे से कुछ पहले तक उनमें से किसी को पता नहीं था कि मौत उनके बेहद करीब पहुंच चुका है। मेटाडोर जब बेहद करीब आ गई तब सभी ने बचने का प्रयास किया, मगर तब तक मेटाडोर सभी को चपेट में ले चुकी थी। वहां पर छाया धुएं का गुब्बार जब छंटा तो भूषण कुमार के प्राण पखेरू हो चुके थे, जबकि उनकी पत्नी बेटी और बहू सहित अन्य लोग घायल हो गए थे। ऐसा प्रतीत होता था कि मेटाडोर पर काल सवार था, जो भूषण कुमार सहित तीन लोगों के प्राण हरने आया था, क्योंकि मेटाडोर न सिर्फ सड़क किनारे कार से टकराई, बल्कि खंभों से टकराते हुए सीधे वहां पलटी, जहां भूषण कुमार व उनके परिवार के सदस्य और अन्य लोग खड़े थे।

इस हादसे के बाद भूषण कुमार की मौत की खबर घर पहुंचते ही कोहराम मच गया। रिश्तेदार और आसपास के लोग दुख की घड़ी में दर्द बांटने उनके घर पहुंचने लगे। भूषण कुमार की पत्नी तृप्ता देवी खुद जिंदगी और मौत से लड़ रही है। उन्हें तो अपने मांग उजड़ जाने तक का ईल्म नहीं है। हादसे के बाद से बेटी सिमरन भी घायल है, मगर खतरे से बाहर है। उसका भी रो-रो कर बुरा हाल है। वहीं कंडक्टर विनय कुमार के घर लांसी में भी मातम का माहौल है, जबकि तीसरे मृतक की देर रात तक शिनाख्त नहीं हो सकी थी।

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