जानें अघोरियों की शव साधना से शिव साधना तक का पूरा सफ़र…
श्रावण मास शिव की आराधना का मास है। भगवान शिव एक ऐसे देव हैं जिन्हें प्रसन्न करने के लिए आसान और जटिल दोनों माध्यम होते हैं। भोले बाबा थोड़े में ही अपने श्रद्धालुओं पर कृपा बरसा देते हैं। ऐसे में भगवान शिव की पूजा सात्विक और तामसिक स्वरूप में भी होती है। सात्विक पूजा जो गृहस्थजन सामान्यतौर पर करते हैं उस तरह से होती है मगर तामसिक पूजा अघोरियों द्वारा की जाती है। ये शैव मतावलंबी होते हैं और माना जाता है कि शिव ने ही तंत्र और अघोरपंथ की रचना की। अघोरियों को बहुत ही रहस्यमी माना जाता है। अघोरियों का जीवन बहुत आश्चर्यों से बना होता है।
अघोरी वह होता है जिसके मन में किसी तरह का भेदभाव नहीं है। वे सभी बातों में सम होते हैं। ये अघोरी जीव का मांस भी भक्षण कर लेते हैं तो स्वादिष्ट पकवान भी ग्रहण कर लेते हैं। ये श्मशान में साधना करने के लिए शव साधना करते हैं। शव साधना के ही साथ ये साधक श्मशान को भी साधते हैं। शिव की साधना करने के लिए ये शव पर पैर रख खड़े होते हैं और फिर साधना करते हैं।
ये मुर्दे की चिता पर मांस और मदिरा अर्पित करते हैं। ये शव साधना और शिव साधना के अलावा श्मशान साधना भी करते हैं साथ ही वे शवपीठ की साधना भी करते हैं जिसमें सांसारिक श्रद्धालु भी शामिल हो सकते हैं। ये अघोरी अपनी साधना से मुर्दे से भी चर्चा करते हैं। इनकी साधना के लिए तारापीठ का श्मशान, त्र्यंबकेश्वर का श्मशान, उज्जैन का श्मशान बेहद उत्तम माने जाते हैं।





