जातिगत भेदभाव व जाति व्यवस्था अंग्रेजों का कुटिल षड्यंत्र था- पार्थ दीक्षित

सुलतानपुर,08 मार्च (UjjawalPrabhat.Com)। आज हिन्दू धर्म में जातिगत भेदभाव और जातिगत दूरी हिन्दू धर्म को वायरस की तरह भीतर से खोखला कर रही है पर क्या ऐसा शुरुवात से था।
आदि काल में तीन तरह के ऋषि होते थे जो ब्राह्मण वर्ग से ऋषि बनते थे, उन्हें ब्रह्ऋषि कहते थे जो क्षत्रिय वर्ग से बनते थे उन्हें राजऋषि और जो बाकीं वर्णो से बनते थे उन्हें “महाऋषि“ कहते थे। वेदों का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा महाऋषियों ने लिखा है। सनातन धर्म में जाति व्यवस्था कभी थी ही नही 12वीं शताब्दी के पहले भेदभाव जाति के आधार पे कहीं है ही नहीं। कोई भी किसी भी वर्ण में प्रवर्तित हो सकता था, जैसे विश्वामित्र राजऋषि से ब्रह्ऋषि बन गए। वर्ण व्यवस्था सिर्फ लड़कों की होती थी, लड़कियों का कोई वर्ण नहीं होता था, जैसे माँ सीता क्षत्रिय परिवार से थी, पर उनके स्वयंवर में ब्राह्मण रावण भी आ सकता था, उसी तरह हज़ारों कहानियां है जहां किसी का भी वर्ण बदला जा सकता था। वर्ण व्यवस्था कर्म प्रधान थी। वो यजुर्वेद में साफ-साफ दर्ज है। मनुस्मृति के एक दूसरे श्लोक के अनुसार शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम, क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को, इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं। मनु कहते हैं- जन्मना जायते शूद्रः अर्थात जन्म से तो सभी मनुष्य शूद्र के रूप में ही पैदा होते हैं। बाद में योग्यता के आधार पर ही व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बनता है। मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी या शूद्र बन जाती है। ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण बन सकती है। हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी योग्यता के बल पर वे ब्रह्मर्षि बने। एक मछुआ (निषाद) मां की संतान व्यास महर्षि व्यास बने। आज भी कथा-भागवत शुरू होने से पहले व्यास पीठ पूजन की परंपरा है। विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने। ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं। जाति का कांसेप्ट हमारे किसी ग्रंथ में है ही नहीं, और वर्ण व्यवस्था मनुष्य के गुणों के आधार पे उनका वर्गीकरण किसी भी समाज के लिए हितकारी ही होगा। पर लार्ड मैकाले को ये आभास हो गया था कि इतनी अच्छी न्याय व्यवस्था और इतने समृद्ध समाज को तोड़ने का एक ही तरीका है, उनके धर्म-ग्रंन्थों में कुछ ऐसा जोड़ दो, जिससे हिन्दू धर्म ही विभाजित हो जाये (ये व्यक्तव्य लार्ड मैकाले ने खुद ब्रिटिश पार्लियामेंट में दिया था।) द माईन्यूट एजुकेशन में मैकाले खुद कहता है कि ना उसने संस्कृत का कभी अध्यन किया है ना ही अरबी का उसके बावजूद, अंग्रेज़ मैकाले को हमारे धर्म ग्रंथ का अनुवाद करने की परमिशन दे देती हैं और मैकाले सबसे पहले मनुसमृति का ही अनुवाद करता है, जिससे साफ-साफ पता चलता है कि ये हिंदुओं को बांटने के लिए पूरा षड्यंत्र अंग्रेजों द्वारा रचित है। सोचने वाली बात ये भी है कि मनु महराज खुद ब्रहृषी नही थें बल्कि महर्षि थे, तो वो क्यों खुद के समाज को गाली देंगे। अभी हाल ही में तमिलनाडु के एक प्रसिद्ध मन्दिर में 21 सूद्र बालको को वेदपाठ कराकर ब्राह्मण की उपाधि दी गयी और उन्हें विभिन्न मंदिरों में पुजारी भी बनाया गया। भारतवंशियों को अपना भोलापन छोड़ना चाहिए, अगर आप इस गलतफहमी में हैं कि आठ सौ साल की गुलामी में आपके धर्मग्रंथों को किसी ने कुछ नहीं किया होगा,तो आपसे बड़ा बेवकूफ कोई नहीं होगा, अपनी जड़ों में जाइये, जातिगत अभिमान को भुला कर अपने धर्म को समझने का प्रयास करिये।
नीरज तिवारी

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