घर वापसी के लिए 30 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों ने लिया कर्ज

दूसरे शहरों से लौटे मजदूरों  में से 53 प्रतिशत लोग फैक्टरियों में काम कर रहे थे और 21 प्रतिशत थे दिहाड़ी मजदूर
 52 फीसदी लोगों के पास है 1 एकड़ से कम जमीन
न्यूज डेस्क
25 मार्च की सुबह देश के बड़े शहरों से प्रवासी मजदूरों का जो पलायन शुरु हुआ वह आज भी जारी है। रेल और सवारी गाडिय़ा बंद होने से ये पैदल ही अपने घरों के लिए निकल गए थे। आज भी सड़कों पर हजारों-लाखों प्रवासी मजदूर भूखे-प्यासे अपने घरों की ओर जाते दिख रहे हैं। बड़े पैमाने पर हो रही इस घर-वापसी की तह में जाएं, तो पाएंगे कि जो लोग लौट रहे हैं, उनके पास लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
पूरे देश में प्रवासी मजूदरों के पैदल आने पर बहस छिड़ी हुई है। नगें पाव, भूखे-प्यासे इन मजदूरों का पुरसाहाल कोई नहीं हैं। सरकार से इन्हें घर पहुंचाने की मांग उठ रही है। बहुत से लोग पैदल आने के लिए इसलिए विवश हैं क्योंकि इनके पास पैसे नहीं है।
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प्रेक्सिस-इंस्टीट्यूट फॉर पार्टिसिपेटरी प्रैक्टिसेस ने अन्य संगठनों के सहयोग से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में लौटे कुछ मजदूरों से तमाम पहलुओं पर राय ली है, जिसमें पता चला है कि दूसरे शहरों से लौटे इन लोगों में से 53 प्रतिशत लोग फैक्टरियों में काम कर रहे थे और 21 प्रतिशत लोग दिहाड़ी मजदूर थे।
इस सर्वे का सैंपल बहुत छोटा है, पर लेकिन इससे अपने घरों की तरफ लौट रहे कामगारों की आर्थिक और सामाजिक हैसियत का अंदाजा मिल जाता है। इसमें 238 मजदूरों से तमाम पहलुओं पर बात की गई थी।
तमाम तरह की कठिनाइयों का सामना कर लौट रहे श्रमिकों की आर्थिक हैसियत देखें, तो लगता है कि लौटने के सिवा उनके पास बहुत विकल्प नहीं था। सर्वे के अनुसार 30 प्रतिशत प्रवासी कामगारों को घर-वापसी के लिए कर्ज लेना पड़ा क्योंकि उनके पास पैसा नहीं बचा था।
सर्वे में शामिल 238 लोगों में 87 प्रतिशत लोगों की मासिक कमाई 5 हजार से 15 हजार रुपए के बीच है। चूंकि, इनमें से 74 प्रतिशत लोग फैक्टरी वर्कर और दिहाड़ी मजदूर हैं और लॉकडाउन के कारण फैक्टरी बंद हो गई और कंस्ट्रक्शन व दूसरे तरह के काम भी ठप हो गए, तो इनकी कमाई पूरी तरह चौपट हो गई।
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8 मई की देर रात श्रमिक स्पेशल ट्रेन से गुजरात से सिवान पहुंचे श्रमिक बलेन्द्र कुमार ने बताया कि वह चार साल से अहमदाबाद में एक फैक्टरी में वेल्डिंग का काम करता थे। लॉकडाउन के कारण फैक्टरी बंद हो गई। मार्च में जो काम किया था, उसका पैसा मिल गया था, तो उसी से इतने दिन किसी तरह खाया। चूंकि पैसा भी खत्म हो रहा था और फैक्टरी मालिक ने बंदी की अवधि का पैसा नहीं दिया, तो मजबूर होकर मैंने घर लौटना पड़ा।
सर्वे रिपोर्ट के संबंध में प्रेक्सिस के सीनियर प्रोग्राम अफसर अभय कुमार ने कहा, ” इस सर्वे में बिहार के मधुबनी और छपरा, झारखंड के तोपचाची गांव और उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में लौटे प्रवासियों को शामिल किया गया था। हम लोगों ने सवालों की एक सूची तैयार की थी। फील्ड में मौजूद लोगों ने प्रवासियों से ये सवाल पूछे और जवाब दर्ज किया।”

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सर्वे में किन बिरादरियों को शामिल करना है, ये पहले से तय नहीं था। फील्ड में मौजूद लोगों ने प्रवासियों से संपर्क किया और सवाल पूछे। बाद में जब इनकी जातिगत पहचान के आंकड़े तैयार किए, तो पता चला कि घर लौटने वाले 238 में से 126 लोग अनुसूचित जाति से और 90 लोग ओबीसी/ईबीसी हैं। इन दोनों को मिला लें, तो 238 में से 91 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति व ओबीसी/ईबीसी से आते हैं जबकि 3 प्रतिशत लोग अनुसूचित जनजाति से आते हैं।
52 प्रतिशत लोगों के पास एक एकड़ से कम जमीन
सर्वे में यह भी पता चला है कि लौटने वाले 238 लोगों में से 52 प्रतिशत लोगों के पास एक एकड़ से कम जमीन है। एक एकड़ से कम जमीन वाले सीमांत किसानों की श्रेणी में आते हैं। वहीं, 29 प्रतिशत लोगों के पास केवल उतनी ही जमीन है, जितने में उनका घर है।
5 प्रतिशत लोग ऐसे मिले, जिनके पास एक बित्ता भी जमीन नहीं है। इस सर्वे में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के रहने वाले फैक्टरी वर्कर राजकुमार के हवाले से बताया गया है कि उन्होंने जब दिल्ली से घर लौटने का सोचा, तो उनके पास महज 1000 रुपए थे। उनके मुताबिक, अगर वह किसी तरह घर नहीं लौटते, तो दिल्ली में भूखों मर जाते।
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