खरी-खरी : करम गति टारे नाही टरे

उर्मिल कुमार थपलियाल
अब भइया जी हमारे लिए जैसे सितंबर वैसे ही अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर हमारे कौन भाग्य के पट खुलने वाले हैं कि  अच्छे दिन आएं। हमारे लिए तो ये महीने हमारी क्रिकेट टीम के पुछल्ले बल्लेबाजों की तरह होते हैं। आउट होने का क्रम आता है तो तू चल मैं आया वाला सिलसिला शुरू हो जाता है।
चूंकि अब अगले महीने से सर्दी शुरू होने की आशंका रहती है तो राजनीतिक सांप नेवले बक्सों में स्वेटर, मफलर आदि तलाशने लगते हैं। सर्दियों में अब उन्हें नंगे रहना अब उन्हें रास नहीं आता। पॉलिटिक्स का बनिया घटतौली और डंडी मारने से बाज नहीं आता। पब्लिक की तकदीर में तो हमेशा अंटा चित्त मोहल्ला गायब ही रहता है। वाकई जब माता के गर्भ का स्थान परखनली ने ले लिया तो होगा क्या।
बाल-बच्चेदार महिलाएं भी बच्चे पालने के लिए मंथली बेसिस पर आया रख रही हैं। मां का दूध पिलाना अब आया के जिम्मे है। दिल्ली में तो मदर डेयरी तक खुल गई है। सबको पता है कि पांव काटने वाला जूता और बाल काटने वाला मित्र किसी को नहीं भाता। सच्चा मित्र वहीं जो गूंगा बहरा हो। सरकार की चाहे जितनी खिल्ली उड़ा लें पर अखबार बंद नहीं होते। फिल्मी हीरोइनों को चूंकि पेमेंट कम होती है इसलिये वे पूरे कपड़े नहीं पहने पातीं। भगवान मुझे तीसरी टांग देता तो मैं तीनों लोकों को लांघ लेता। दूसरों की निंदा करने से जिस रस की प्राप्ति होती है उसका कोई मुकाबला नहीं। अपनी निंदा सुनने से पहले तो अच्छा है कि कान ही फूट जाए। द्रौपदी साड़ी पहने हो तो चीरहरण तभी संभव है। दूसरों के फटे में टांग अड़ाने का मतलब पत्रकारिकता नहीं होता।
जो सरकारी विज्ञापनों की भीख बिना चलती रहे उसे पीत पत्रकारिता कहते हैं। जो सबसे कम पढ़ा जाए उसे संपादकीय कहते हैं। मर्दाना कमजोरी दूर करने के विज्ञापन तो लोगों ने कंठस्थ कर लिये हैं। ये बिल्कुल सच है कि जो न खुद सोवे और न दूसरों को सोने दे उसे चौकीदार कहते हैं। जवानी में देखे गए सपने ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होते कलर वाई टेक्नीकलर होते हैं।
अमित शाह न होते तो नरेंद्र मोदी इतने बलवान न होते आखिर हनुमान को उनकी ताकत की बात जामवंत ने ही तो बताई थी।
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