क्या है परमिसिव पेरेंटिंग? समझिए कैसे यह बच्चों के बर्ताव में ला सकती है बड़े बदलाव

हर माता-पिता अपने बच्चे को दुनिया की सारी खुशियां देना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारा बच्चा हमसे डरे नहीं, बल्कि हमें अपना सबसे अच्छा दोस्त माने और अपनी हर बात हमसे शेयर करे, लेकिन क्या ‘दोस्त’ बनने की चाहत में हम अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां तो नहीं कर रहे, जो आगे चलकर बच्चे के लिए ही नुकसानदेह साबित हों? यहीं से चर्चा शुरू होती है ‘परमिसिव पेरेंटिंग’ की।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह पेरेंटिंग स्टाइल क्या है और यह आपके बच्चे के स्वभाव को कैसे बदल सकता है।
परमिसिव पेरेंटिंग आखिर है क्या?
इसे अगर सीधे शब्दों में कहा जाए, तो यह बच्चों की परवरिश का वह तरीका है जिसमें माता-पिता बेहद नरम होते हैं। ऐसे पेरेंट्स बच्चों पर कोई सख्त नियम नहीं थोपते। वे बच्चों को अनुशासन में रखने या उन्हें रोकने-टोकने के बजाय उनकी हर जिद और मांग पूरी करने की कोशिश करते हैं।
इस तरीके में माता-पिता एक ‘अभिभावक’ की बजाय एक ‘दोस्त’ की भूमिका ज्यादा निभाते हैं।
कैसे पहचानें कि आप परमिसिव पेरेंट हैं या नहीं?
आप बच्चे को किसी भी बात के लिए ‘ना’ कहने से बचते हैं।
आपके घर में सोने, जागने या पढ़ाई करने का कोई पक्का रूटीन या नियम नहीं है।
बच्चा कोई गलती करता है, तो आप उसे समझाने या डांटने के बजाय नजरअंदाज कर देते हैं।
रोने या जिद करने पर आप बच्चे की हर डिमांड तुरंत मान लेते हैं।
बच्चों के बरताव पर इसका क्या असर पड़ता है?
शुरुआत में यह तरीका बहुत अच्छा लग सकता है क्योंकि घर में लड़ाई-झगड़ा नहीं होता और बच्चा खुश नजर आता है, लेकिन लंबे समय में इसके कुछ गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं:
अनुशासन की भारी कमी
जब बच्चों को बचपन से नियम मानने की आदत नहीं डाली जाती, तो वे बड़े होकर भी नियमों का पालन नहीं कर पाते। उन्हें स्कूल, कॉलेज या आगे चलकर ऑफिस के माहौल में ढलने में बहुत परेशानी होती है क्योंकि वहां हर चीज उनके हिसाब से नहीं चलती।
‘ना’ सुनने की आदत न होना
घर में हमेशा अपनी बात मनवाने वाले बच्चों को जब बाहर की दुनिया में किसी काम के लिए मना किया जाता है, तो वे उसे बर्दाश्त नहीं कर पाते। ‘ना’ सुनने की आदत न होने के कारण ऐसे बच्चे जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, चिड़चिड़े हो जाते हैं और कभी-कभी डिप्रेशन का शिकार भी हो सकते हैं।
जिम्मेदारियों से भागना
जब बच्चे को बिना कुछ किए ही सब कुछ आसानी से मिल जाता है, तो वे मेहनत की कीमत नहीं समझ पाते। ऐसे बच्चे अपनी जिम्मेदारियों को उठाने से कतराते हैं और अक्सर अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहते हैं।
भावनाओं पर कंट्रोल न होना
चूंकि ऐसे बच्चों को कभी किसी ने रोका-टोका नहीं होता, इसलिए उन्हें अपनी भावनाओं (जैसे गुस्सा, निराशा या उदासी) को सही तरीके से संभालना नहीं आता। जरा सी मुश्किल आने पर वे घबरा जाते हैं या आक्रामक हो जाते हैं।
क्या कोई बीच का रास्ता है?
बिल्कुल! बच्चों से बेइंतहा प्यार करना और उनका दोस्त बनना बहुत अच्छी बात है, लेकिन उनके बेहतर भविष्य के लिए उन्हें सही-गलत का फर्क समझाना भी हमारी ही जिम्मेदारी है।
परवरिश में प्यार और अनुशासन का बैलेंस होना बहुत जरूरी है। बच्चे को यह अहसास होना चाहिए कि आप हर कदम पर उनके साथ हैं, लेकिन घर के कुछ नियम हैं जिन्हें मानना भी उतना ही जरूरी है।





