कोरोना में लाकडाउन की मुसहर बस्तियों पर मार, सूख रही बच्चों की अंतड़ियां, खा रहे घास

लॉकडाउन ने ग़रीबों के ऊपर बड़ा जुल्म ढ़ाया है. उन्हें खाने को नहीं मिल रहा है. दिहाड़ी मज़दूरों की भी हालत ख़राब है. इस बीच वाराणसी के बड़ागांव से दिल पसीज देने वाली ख़बर आई है. जनसंदेश टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, यहां के कोइरीपुर गांव में भूखे वनवासी बच्चे अंकरी घास और नमक खा रहे हैं. वहीं, आलू की जुताई हुए खेत में बिने हुए आलू को भी खा रहे हैं. ये बच्चे मुसहर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं.
इसकी सूचना मिलते ही सुनील और सचिन नाम के दो युवक वहां पहुंचे और आंटा, चावल, साबुन, तेल सहित ज़रूरी सामान उन्हें वितरित किए. उन्होंने आश्वासन भी दिया कि वे दोबारा आएंगे और उन्हें मदद करेंगे. इसके बाद बड़ागांव धानाध्यक्ष और प्रधान ने भी परिवार को 10-10 किलो चावल और 2-2 किलो दाल सहित दूसरी खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई. दूसरी तरफ़ ग्राम प्रधान ने आश्वासन दिया है कि वे 17 से 40 परिवार वाले इन लोगों को राशन की कमी नहीं होने देंगे.
बता दें कि इस परिवार के ज्यादातर लोग ईंट भट्टे पर काम करते हैं. 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगने के बाद से न तो उनकी कुछ कमाई हुई और नह कुछ खाने को मिला. ऐसे में वे अंकरी घास खाने को मज़बूर हो गए. ये घास पशुओं को चारे के रूप में खिलाया जाता है. इसमें मटर की छोटी फलियां भी लगी होती हैं. बता दें कि लॉकडाउन के बाद से पूरे देश में दिहाड़ी मजदूरों की हालत ख़राब है. वे किसी तरह अपनी जिंदगी काट रहे हैं. वहीं कई जगह कुछ समाजसेवी आगे आए हैं जो उनकी मदद कर रहे हैं. दिल्ली-मुंबई जैसी जगहों से तो लोग पैदल अपने गांवों के लिए निकल लिए हैं.
डीएम ने किया ख़ारिज
दूसरी तरफ़ जिलाधिकारी ने कहा है कि बच्चों के घास खाने की प्रकाशित खबर वास्तविकता के विपरीत है. गांव के बच्चे फसल के साथ उगने वाली अखरी दाल और चने की बालियां तोड़कर खाते हैं. बच्चे अखरी दाल की बालियां खा रहे थे. घास खाना लिखना ठीक नहीं है

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