कोरोना : प्रकृति के शोषण से जड़ी बूटियाँ प्रभावहीन हो जाती हैं

आयुर्वेद की नीव अथर्ववेद ही है –इस वेद का सबसे उल्लेखनीय विषय आयुर्विज्ञान ही है.

–अथर्ववेद में जीवाणुविज्ञान और औषधियों के सम्बन्ध में विस्तार से जानकारी मिलती है

–एक उल्लेखनीय तथ्य यह देखने को मिलता है की उपचारों को प्रणालीबद्ध करते हुए उन्हें वर्गीकृत करने का प्रयास भी किया गया है

—चार वेदों में सर्वाधिक रोग निवारण सूक्त अथर्ववेद में हैं \अन्यान्य रोगों के लिए तमाम वनस्पतियों का उल्लेख भी किया गया है

–चतुर्थ कांड का तेरहवां सूक्त उल्लेखनीय है

–इसका तीसरा मन्त्र दृष्टव्य है —

आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद् रपः
त्वं हि विश्वभेषज देवानां दूत ई यते

–अर्थात हे वायु सभी रोगों का विनाश करने वाली जड़ी बूटी लाओ तथा रोग उत्पन्न करने वाले पाप का विनाश करो –तुम सभी व्याधियों को दूर करने वाली हो इसीलिए तुम्हे इंद्र आदि देवों का दैत कहा जाता है.

–आज प्रकृति का जितना शोषण हो चुका है वायु जड़ी बूटी का गंध कहाँ से लाएं ?

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