कोरोना ने पितरों का पिंडदान भी रोक दिया

जुबिली न्यूज डेस्क
आज के पहले जो कभी नहीं हुआ वो कोरोना काल में हो रहा है। वो काम तब भी नहीं हुआ था जब सौ साल पहले जब पूरी दुनिया में स्पेनिश फ्लू फैला था। जी हां, इस बार पितृपक्ष के दौरान लोग अपने पितरों की शांति व मोक्ष के लिए पिंडदान व तर्पण नहीं कर सकेंगे।
कोरोना काल में देश में महीनों धार्मिक कामकाज बंद रहा। महीनों धर्मस्थलों पर भी ताले लगे रहे। देश के सभी मंदिरों के कपाट बंद काफी दिनों तक बंद रहे।
महीनों बाद कहीं-कहीं ऑनलाइन दर्शन की व्यवस्था की गई, पर आज भी कई धार्मिक कार्यक्रमों व उत्सवों पर रोक बरकरार है। इसी वजह से इस बार पितृपक्ष के दौरान मोक्षभूमि गया में लोग अपने मृत परिजनों यानि पितरों की शांति व मोक्ष के लिए पिंडदान व तर्पण नहीं कर सकेंगे।
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बड़े-बुजुर्गों की माने तो उनके होश में ऐसा कभी नहीं हुआ कि कभी विष्णुपद मंदिर का कपाट बंद हुआ हो और कभी भी पितृपक्ष महासंगम पर रोक लगी हो। जो कभी नहीं वह कोरोना काल में हो रहा है। इस बार कोरोना महामारी के कारण पितृपक्ष मेले की इजाजत भी नहीं दी जा रही।
गया में नहीं होगा पितरो का पिंडदान
बच्चों को छोड़ दिया जाए तो हिंदु परिवार में शायद ही कोई हो जिसे गयाधाम का महत्व पता न हो। विदेशों में बसे हिंदु तक अपने पितरो का पिंडदान करने गया आते हैं। आंकड़ों के मुताबिक करीब छह लाख से ज्यादा लोग हर साल अपने पुरखों की आत्मा की शांति के लिए इस अवधि में यहां आकर पिंडदान करते हैं। इनमें बड़ी संख्या में विदेशी भी शामिल रहते हैं।
बिहार की राजधानी पटना से करीब 105 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गयाधाम। इसे गया के नाम से भी जाना जाता है। यह भूमि जितनी हिन्दुओं के लिए महत्वपूर्ण है उतनी ही बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी।
गया हिन्दुओं के लिए मोक्षभूमि है तो बौद्धों के लिए ज्ञानभूमि। हिन्दू धर्मग्रंथों की मान्यता व सनातन धर्म की आस्था के अनुसार मृतात्माओं को मोक्ष व शांति तभी मिलती है जब उनके वंशज गया आकर अंत:सलिला फल्गु नदी के तट पर विष्णुपद मंदिर में अक्षयवट के नीचे उनके नाम पर श्राद्ध करते हैं।
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अश्विन माह के कृष्ण पक्ष में लगने वाले पंद्रह दिनों के पितृपक्ष को लेकर यहां एक महीने तक पितृपक्ष मेला लगता है।
श्राद्ध की तीन मुख्य विधियां हैं-पिंडदान, तर्पण व ब्राह्मण भोजन। श्राद्ध के एक दिन, सात दिन या 17 दिन के कर्मकांड का विधान है। फल्गु तट पर बसे गयाधाम में पिंडदान व तर्पण का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि अनादि काल से यहां पितरों का श्राद्ध किया जाता रहा है। महाभारत के वनपर्व में पांडवों की गया यात्रा का उल्लेख है। भगवान श्रीराम ने भी अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान यहीं किया था।
रोजी-रोटी पर आफत
कोरोना महामारी को देखते हुए इस साल 3 सितंबर से शुरू होकर 17 सितंबर तक चलने वाले पितृपक्ष मेले को जनहित में स्थगित कर दिया गया है। मेले का आयोजन करने वाले बिहार सरकार के राजस्व व भूमि सुधार विभाग ने कहा है कि कोरोना महामारी की वजह से पितृपक्ष मेला में आने वाले पिंडदानियों द्वारा शारीरिक दूरी के अनुपालन में होने वाली कठिनाइयों एवं संभावित कोरोना संक्रमण के मद्देनजर जनहित में पितृपक्ष मेला, 2020 स्थगित किया गया है।
इसके साथ ही केंद्र व बिहार सरकार के निर्देशों का भी हवाला दिया गया है। यह भी कहा गया है कि इस आदेश का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ द इपिडेमिक डिजीज एक्ट,1987 एवं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के प्रावधानों के तहत विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी।
गया के जिलाधिकारी अभिषेक सिंह ने विष्णुपद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के सदस्यों के साथ बैठक में आग्रह किया कि वे प्रदेश के साथ ही देशभर से आनेवाले तीर्थयात्रियों को यह सुझाव दें कि कोरोना संकट के कारण यहां नहीं आएं। मेला में जुटने वाली भीड़ के कारण पंडा समाज व इनसे जुड़े लोगों तथा तीर्थयात्रियों के बीच कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका के कारण ही यह निर्णय लिया गया। वहीं एसएसपी राजीव मिश्रा ने भी पंडा समाज से इस निर्णय के अनुपालन में सहयोग करने का आग्रह किया।
हालांकि बिहार में पूर्व में जारी आदेश के अनुसार छह सितंबर तक लॉकडाउन लागू है। बिहार सरकार के इस निर्णय से हजारों लोगों की रोजी-रोटी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
श्राद्ध कर्मकांड कराने वाले गयापाल पंडों व ब्राह्मणों के अलावा होटल, लॉज, धर्मशाला, रेस्तरां व वाहन संचालक एवं छोटे-छोटे दुकानदारों की सालभर की रोजी-रोटी इसी पितृपक्ष मेले पर आश्रित है। इससे होने वाली आय से ही वे अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं।

फिलहाल सरकार के इस निर्देश का गया के पंडो ने विरोध करना शुरु कर दिया है। विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति का कहना है कि पितृपक्ष मेले को स्थगित किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। धर्म और आस्था पर रोक लगाई जा रही है। समिति इसकी निंदा करती है।
समिति का कहना है कि पितृपक्ष मेले पर निर्भर हजारों लोगों के समक्ष भूखों मरने की नौबत आ गई है। उनकी जीविका का सवाल है। जो लोग पिंडदान करना चाहते हैं उन्हें गया आने दिया जाए। हम पंडा समाज के लोग कोरोना गाइडलाइन के अनुसार पिंडदान व तर्पण कराने को तैयार है। इस दौरान फिजिकल डिस्टेंशिंग का पूरा ख्याल रखा जाएगा।
ऑनलाइन पिंडदान का विरोध
पितृपक्ष मेले के स्थगित होने के साथ ही ऑनलाइन पिंडदान की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। हालांकि बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम ने छह साल पहले इसकी व्यवस्था की थी। किसी कारण वश जो लोग गया नहीं आ सकते उनके लिए निगम ने ई-पिंडदान के तहत वेबसाइट लांच किया था। इसमें पैकेज के तहत मांगी गई राशि का भुगतान करने पर उनके पितरों का विष्णुपद मंदिर एवं अक्षयवट में पिंडदान व फल्गु में तर्पण का प्रावधान है। बाद में कर्मकांड की तस्वीर व वीडियो संबंधित व्यक्ति को उपलब्ध करा दी जाती है।
लेकिन गया के पंडा समाज ने इसे शास्त्र के प्रतिकूल बताते हुए प्रारंभ से ही ई-पिंडदान का विरोध किया है। उनका कहना है कि कुल (वंश) के बाहर का कोई व्यक्ति कैसे पिंडदान कर सकता है।

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