काव्य के गहने हैं अलंकार

डॉ अरविन्द तिवारी
काव्य का सौंदर्य बढ़ाने वाले शब्दों को अलंकार कहा जाता है। ‘अलंकरोति इति अलंकार: अर्थात जो अलंकृत करता है, वही अलंकार है। अलंकार, कविता-कामिनी के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले तत्व होते हैं अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना है – अलम + कार। अलम का अर्थ है ‘आभूषण’। जिस तरह से एक नारी अपनी सुन्दरता को बढ़ाने के लिए शरीर पर आभूषण ग्रहण करती हैं, उसी प्रकार भाषा को सुन्दर बनाने के लिए अलंकारों का इस्तेमाल में लाया जाता है।

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अलंकार के भेद
आचार्यों ने अलंकार के मुख्य रूप से तीन भेद बताये हैं – शब्दालंकार, अर्थालंकार एवं उभयालंकार।
शब्दालंकार अलंकार : शब्दालंकार दो शब्दों से मिलकर बना है – शब्द + अलंकार, जिसके दो रूप होते हैं – ध्वनि और अर्थ। ध्वनि के आधार पर शब्दालंकार की सृष्टि की जाती है । जब अलंकार किसी विशेष शब्द की स्थिति में ही रहे और उस शब्द की जगह पर कोई और पर्यायवाची शब्द का इस्तेमाल कर देने से फिर उस शब्द का अस्तित्व ही न बचे तो ऐसी स्थिति को शब्दालंकार कहते हैं । अर्थात जिस अलंकार में शब्दों को प्रयोग करने से कोई चमत्कार हो जाता है और उन शब्दों की जगह पर समानार्थी शब्द को रखने से वो चमत्कार कहीं गायब हो जाता है तो ऐसी प्रक्रिया को शब्दालंकार कहा जाता है। शब्दालंकार छह प्रकार के होते हैं – अनुप्रास, यमक, पुनरुक्ति, विप्सा, वक्रोक्ति और श्लेष अलंकार।
अनुप्रास अलंकार : अनुप्रास शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – अनु + प्रास। अनु का अर्थ है- बार-बार और प्रास का अर्थ होता है – वर्ण। जब किसी शब्द का बार-बार इस्तेमाल किया जाए और उस शब्द से जो चमत्कार होता है उसे अनुप्रास अलंकार कहते है। जैसे – मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत बुलाए।
यमक अलंकार : यमक शब्द का अर्थ होता है – दो। जब किसी शब्द को दो या दो से अधिक प्रयोग में लाया जाए और हर बार उसका अर्थ अलग-अलग आये तो वहां पर यमक अलंकार होता है । जैसे :- जिसकी समानता किसी ने कभी पाई नहीं; पाई के नहीं हैं अब वे ही लाल माई के। यहाँ ‘पाई’ शब्द दो बार आया है। दोनों के क्रमशः ‘पाना’ और ‘पैसा’ दो भिन्न अर्थ हैं।
पुनरुक्ति अलंकार : पुनरुक्ति दो शब्दों से मिलकर बना हुआ होता है – पुन: +उक्ति। जब कोई शब्द दो बार दोहराया जाता है तो वहां पर पुनरुक्ति अलंकार होता है। जैसे – मधुर मधुर मेरे दीपक जल।
विप्सा अलंकार : आदर, हर्ष, शोक, विस्मय बोधक भावों को प्रभावशाली रूप से व्यक्त करने के लिए शब्दों की पुनरावृत्ति को विप्सा अलंकार कहते हैं। जैसे – मोहि-मोहि मोहन को मन भयो राधामय। राधा मन मोहि-मोहि मोहन मयी-मयी।।
वक्रोक्ति अलंकार : जहां पर वक्ता के द्वारा बोले गए शब्दों का श्रोता अलग अर्थ निकाले उसे वक्रोक्ति अलंकार कहा जाता है। जैसे – रुको, मत जाने दो। रुको मत, जाने दो।
श्लेष अलंकार : जहां पर कोई एक शब्द एक ही बार आये पर उसके अर्थ भिन्न-भिन्न आये, वहां पर श्लेष अलंकार होता है। जैसे – रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। पानी गए न उबरै मोती मानस चून।
अर्थालंकार : जहां पर अर्थ के माध्यम से काव्य में चमत्कार होता हो वहां अर्थालंकार होता है। अर्थालंकार के कई भेद हैं। यहां पर मुख्य छह अर्थालंकारों की चर्चा की जा रही है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, द्रष्टान्त, संदेह तथा अतिश्योक्ति अलंकार।
उपमा अलंकार : उपमा शब्द का अर्थ है तुलना। जब किसी व्यक्ति या वस्तु की तुलना किसी दूसरे यक्ति या वस्तु से की जाती हैं, तो वहाँ पर उपमा अलंकार होताका प्रयोग किया जाता है। जैसे :- सागर-सा गंभीर ह्रदय हो, गिरी-सा ऊँचा हो जिसका मन। उपमा अलंकार के चार अंग होते हैं – उपमेय, उपमान, वाचक शब्द एवं साधारण धर्म। उदाहरण – पीपर पात सरिस मन डोला।

रूपक अलंकार : जहां किन्हीं दो व्यक्ति या वस्तुओं में इतनी समानता हो कि दोनों में अंतर करना मुश्किल हो जाए वहां रूपक अलंकार होता है। अर्थात जहां उपमेय उपमान का रूप धारण कर ले वहां रूपक अलंकार होता है। या जहां उसमेय का उपमान से भेद रहित आरोप किया गया हो वहां रूपक अलंकार होता है। जैसे – ‘चरण – कमल बंदौ हरि राई’। यहां पर हरि के चरण को कमल का रूप दिया गया है। अतः यहां रूपक अलंकार है।
उत्प्रेक्षा अलंकार : जहां पर उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता है अर्थात अप्रस्तुत को प्रस्तुत मानकर वर्णन किया जाता है, वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। जैसे – ‘सखि सोहत गोपाल के, उर गुंजन की माल। बाहर सोहत मनु पिये, दावानल की ज्वाल।।’ यहां पर गुंजन की माला उपमेय में दावानल की ज्वाल उपमान के संभावना होने से उत्प्रेक्षा अलंकार है।
द्रष्टान्त अलंकार : जहां उपमेय और उपमान तथा उनके साधारण धर्मों में बिंब प्रतिबिंब भाव होता है वहां दृष्टांत अलंकार होता है। जैसे- ‘सुख-दुःख के मधुर मिलन से, यह जीवन हो परीपुरण। फिर घन में ओझल हो शशी, फिर शशी से ओझल हो घन।’ यहां सुख-दुःख तथा शशी-घन में बिंब प्रतिबिंब का भाव है इसलिए दृष्टांत अलंकार है।
संदेह अलंकार : जहां दो वस्तुओं या क्रियाओं में इतनी समानता हो कि उसमें अनेक वस्तुओं के होने का संदेह हो और यह संदेह अंत तक बना रहे तो वहां संदेह अलंकार होता है। जैसे – ‘हरि -मुख यह आली ! किधौ, कैधौ उयो मयंक? हे सखी ! यह हरि का मुख है या चन्द्रमा उगा है? यहां हरि के मुख को देखकर सखी को निश्चय नहीं होता कि यह हरि का मुख है या चन्द्रमा है।
अतिश्योक्ति अलंकार : जहां किसी वस्तु या बात का वर्णन अत्यधिक बढ़ा- चढ़ा कर किया जाए वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है। जैसे- हनुमान की पूंछ में, लगन न पाई आग। लंका सगरी जल गई, गए निशाचर भाग।’ यहां हनुमान की पूंछ में आग लग भी नहीं पाई, सारी लंका जल गई और सारे राक्षस डरकर भाग गए।
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