काव्य का प्राण है ‘रस’

डॉ अरविंद तिवारी
रस काव्य का प्राणतत्व है। रस का संबंध ‘सृ‘ धातु से है, जिसका अर्थ है बहना, अर्थात जो भाव रूप में हृदय में बहता है उसे रस कहते हैं। रसवादी आचार्यों ने रस की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं दी हैं। काव्य पढ़ने, सुनने या देखने से श्रोता, पाठक या दर्शक एक ऐसी भावभूमि पर पहुंच जाते हैं जहां चारों तरफ शुद्ध आनंदमई चेतना का साम्राज्य रहता है। इस अवस्था को ही रस कहा जाता है। आचार्य भरतमुनि के अनुसार – विभावअनुभावसंचारसंयोगाद्रसनिष्पत्ति। रस की निष्पत्ति विभाव अनुभाव और संचारी भाव के सहयोग से होती है।
रस के भेद : रस मुख्यत 10 भेद होते हैं, परंतु आचार्यों द्वारा एक और रस भी स्वीकृत किया गया है, जिसे हम भक्ति रस कहते हैं।
1 – श्रृंगार रस : श्रृंगार रस की उत्पत्ति ‘श्रृंग + आर‘ से हुई है। इसमें ‘श्रृंग’ का अर्थ है, काम की वृद्धि तथा ‘आर’ का अर्थ है प्राप्ति। अर्थात कामवासना की वृद्धि एवं प्राप्ति ही श्रृंगार है। इसका स्थाई भाव ‘रति’ है। श्रृंगार का आलंबन विभाव नायक-नायिका है। उद्दीपन विभाव नायक-नायिका की परस्पर चेष्टाएं, लता कुंज आदि है। अनुभाव अनुराग पूर्वक अवलोकन, आलिंगन आदि है। श्रृंगार रस के दो रूप हैं – संयोग श्रृंगार एवं वियोग श्रृंगार। संयोग श्रृंगार के अंतर्गत नायक–नायिका के परस्पर मिलन, प्रेमपूर्ण कार्यकलाप एवं सुखद अनुभूतियों का वर्णन होता है। जैसे ‘कहत नटत रीझत खीझत, मिलत खिलत लजियात। भरै भौन में करत है, नैनन ही सों बात।‘
वियोग श्रृंगार वहां होता है जहां नायक-नायिका में परस्पर उत्कट प्रेम होने के बाद भी उनका मिलन नहीं हो पाता। इसके अंतर्गत विरह से व्यथित नायक-नायिका के मनोभावों को व्यक्त किया जाता है। जैसे – ‘मधुबन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम– सुंदर के ठाड़े क्यों न जरें।‘
करुण रस : जहां शोक भाव उपस्थित होता है, वहां करुण रस होता है। काव्य शास्त्र के अनुसार शोक नामक स्थाई भाव अपने अनुकूल विभाव, अनुभाव एवं संचारी भावों के सहयोग से अभिव्यक्त होकर जब आस्वाद का रूप धारण कर लेता है तब उसे करुण रस कहा जाता है। प्रियजन का वियोग, दरिद्रता, दुख पूर्ण परिस्थितियां आदि आलंबन है। प्रिय व्यक्ति की वस्तुएं, संकटपूर्ण परिस्थितियां आदि उद्दीपन विभाव है। करुण रस के अनुभाव रोना, छाती पीटना, आंसू बहाना, छटपटाना आदि अनुभाव है। मोह, जड़ता, ग्लानि, चिंता, स्मृति, आदि संचारी भाव आते हैं। उदाहरण – ‘राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरह राउ गयऊ सुरधाय।‘
3 – वीर रस : जहां विषय और वर्णन में उत्साह युक्त वीरता के भाव को प्रदर्शित किया जाता है वहां वीर रस होता है। काव्य शास्त्र के अनुसार सहृदय के हृदय में विद्यमान उत्साह नामक स्थाई भाव अपने अनुरूप विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के सहयोग से अभिव्यक्त होकर जब आस्वाद का रूप धारण कर लेता है तब उसे वीर रस कहा जाता है। वीर रस का आलंबन – शत्रु, तीर्थ स्थान, धार्मिक ग्रंथ माना गया है। शत्रु का पराक्रम, धार्मिक इतिहास आदि अन्य व्यक्ति की दुर्दशा वीर रस का उद्दीपन विभाव है। याचक का सत्कार, धर्म के लिए कष्ट सहना अनुभाव है। स्मृति, गर्व, हर्ष, मति आदि वीर रस के संचारी भाव हैं। उदाहरण – ‘मैं सत्य कहता हूं सखे, सुकुमार मत जानो मुझे। यमराज से भी युद्ध को प्रस्तुत सदा मानो मुझे ।‘
4 – हास्य रस : हास्य रस मनोरंजक है। हास्य नामक स्थाई भाव अपने अनुकूल, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के सहयोग से अभिव्यक्त होकर जब आस्वाद का रूप धारण कर लेता है तब उसे हास्य कहा जाता है। सामान्य विकृत आकार-प्रकार वेशभूषा वाणी तथा आंगिक चेष्टाओं आदि को देखने से हास्य रस की निष्पत्ति होती है।
5 – रौद्र रस : सहृदय में विद्यमान क्रोध रस नामक स्थाई भाव अपने अनुरूप विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के सहयोग से अभिव्यक्त होकर आस्वाद का रूप धारण कर लेता है, तब उसे रौद्र कहा जाता है। अपराधी, शत्रु, या दुराचारी रौद्र का आलंबन है। निंदा, अपमानजनक वाक्य आदि उद्दीपन विभाव है। आंखों का लाल होना, शत्रुओं को ललकारना आदि रौद्र रस का अनुभाव है। मोह, उग्रता, उत्सुकता आदि संचारी भाव है। उदाहरण – ‘श्रीकृष्ण के सुन वचन, अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। लब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे।‘
6 – भयानक रस : काव्य शास्त्र के अनुसार किसी बलवान शत्रु या भयानक वस्तु को देखने पर उत्पन्न भय ही भयानक रस है। भय नामक स्थाई भाव जब अपने अनुरूप आलंबन, उद्दीपन एवं संचारी भावों का सहयोग प्राप्त कर आस्वाद का रूप धारण कर लेता है तो इसे भयानक कहा जाता है। इसका आलंबन जंगली जानवर अथवा बलवान शत्रु है। निस्सहाय और निर्बल होना शत्रुओं या हिंसक जीवो की चेष्टाएं उद्दीपन है कंपन, रोमांच आदि इसके अनुभाव हैं। संचारी भावों के अंतर्गत प्रश्नों, शंका, चिंता, आवेश आदि आते हैं।
उदाहरण – ‘एक और अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय। विकल बटोही बीच ही परयो मूर्छा खाए।‘
7 – वीभत्स रस : वीभत्स घृणा भाव को प्रकट करने वाला रस है। जब घृणा या जुगुप्सा का भाव अपने अनुरूप आलंबन, उद्दीपन एवं संचारी भाव के सहयोग से आस्वाद का रूप धारण कर लेता है तो इसे वीभत्स रस कहा जाता है। घृणास्पद व्यक्ति या वस्तुएं इसका आलंबन है। घृणित चेष्टाएं एवं ऐसी वस्तुओं की स्मृति उद्दीपन विभाव है। झुकना, आंखें मूंद लेना इसके अनुभाव हैं, जबकि इसके अंतर्गत मोह, व्याधि, मरण, मूर्छा आदि संचारी भाव है। उदाहरण – ‘सिर पै बैठ्यो काग, आंख दोउ खात निकारत। खींचत जिभहि स्यार, अतिहि आनंद उर धारत।‘
8 – अद्भुत रस : जो विस्मय भाव अपने अनुकूल आलंबन, उद्दीपन, अनुभाव और संचारी भाव का संयोग पाकर आस्वाद का रूप धारण कर लेता है उसे अद्भुत रस कहते हैं। इसका आलंबन आलौकिक या विचित्र वस्तु या व्यक्ति है। वर्णन उद्दीपन है। वितर्क, आवेश, हर्ष, त्रासदी इसके संचारी भाव हैं। उदाहरण – ‘अखिल भुवन चर अचर सब , हरिमुख में लखि मात। चकित भई गदगद वचन विकसित दृग पुलकात।‘
9 – शांत रस : तत्वज्ञान और वैराग्य से शांत रस की उत्पत्ति मानी गई है। इसका स्थाई भाव निर्वेद है, जो अपने अनुरूप विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयुक्त होकर आस्वाद का रूप धारण करके शांत रस रूप में परिणत हो जाता है। संसार की क्षणभंगुरता कालचक्र की प्रबलता आदि इसके आलंबन है। संसार के प्रति मन न लगना उचाटन का भाव या चेष्टाएं अनुभाव है जबकि धृति, मति, विबोध, चिंता आदि इसके संचारी भाव है। उदाहरणत – ‘ मन पछितैही अवसर बीते।‘
वात्सल्य रस : माता – पिता एवं संतान के प्रेम भाव को प्रकट करने वाला रस वात्सल्य रस है। वत्सल नामक भाव जब अपने अनुरूप विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से युक्त होकर आस्वाद का रूप धारण कर लेता है तब वह वत्सल रस में परिणत हो जाता है। माता– पिता एवं संतान इसके आलंबन है। माता– पिता संतान के मध्य क्रियाकलाप उद्दीपन है। आश्रय की चेष्टाएं प्रसन्नता का भाव आदि अनुभव है जबकि हर्ष, गर्व आदि संचारी भाव हैं।
उदाहरण – ‘किलकत कान्ह घुटवानि आवत। मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबैं धावत।‘
11- भक्ति रस : भक्ति रस का स्थाई भाव है दास्य। इस रस में प्रभु की भक्ति और उनके गुणगान को देखा जा सकता है। जैसे – ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।‘
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