कांग्रेसियों को क्या हो गया?

गैरसैंण(मुरारी सिंह पहाड़ी): निष्क्रियता की भी हद होती है। उत्तराखंड की कांग्रेस पार्टी इसकी जीती जागती मिसाल है। आज से गैरसैंण में विधान सभा का बजट सत्र शुरू हुआ। कांग्रेस वाले रातभर योजना बनाते रहे। सुबह मुरझाए हुए सदन में आए। महामहिम राज्यपाल का अभिभाषण शुरू हुआ। आधे घंटे सुनते रहे। फिर अचानक से उन्होंने एक दूसरे को इशारा किया। फिर नारे लगाते हुए बाहर लॉबी में बैठ गए। नारे भी मरियल सी आवाज में। दो चार ने हाथ में तख्तियां भी ले रखी थी कि ऐसा राज्यपाल नहीं चलेगा, रट्टू तोता नहीं चलेगा। नारे बोलते हुए उनके चेहरों पर न कोई जोश, न आक्रोश। पता नहीं क्या हो गया इन कांग्रेसियों को? ऐसा भी नहीं कि बाहर आकर कोई विरोध कर रहे हों। लॉबी में सोफों में धंस गए और चाय बिस्किट खाने लगे। हा हू करने लगे। राज्यपाल ने डेढ़ घंटे का भाषण दिया, जिसे कांग्रेसी विधायकों ने टीवी पर आराम से देखा। चलो टीवी के सामने ही विरोध करते, वो भी नहीं हुआ।

उसके बाद दो बजे विधानसभा अध्यक्ष ने वही भाषण कुछ देर तक पढ़ा और सदन तीन बजे तक स्थगित हो गया। तीन बजे मुख्यमंत्री ने बजट सदन के पटल पर रखा। वे पूरी तैयारी के साथ सदन में आए और उन्होंने अपना बजट भाषण पढ़ना शुरू किया। सोचा कि अब तो विपक्ष अपना कुछ जलवा दिखाएगा। लेकिन उनकी मूर्खता देखिए कि वे सदन में आए ही नहीं। दो तीन निर्दलीय विधायकों को छोड़ कर बाकी कहीं गायब हो गए। वे मीडिया सेंटर में चले गए। उन्हें आशा थी कि पत्रकार उनकी बाइट लेंगे। लेकिन एक दो को छोड़ कर किसी को यह सौभाग्य भी नहीं मिला। भई, आप विरोध ही करना चाहते थे तो सदन के भीतर आते। बजट भाषण सुनते। यदि कोई बात अच्छी नहीं लगती तो विरोध करते। आम तौर पर यही परिपाटी रही है। संसद में भी ऐसा ही होता है।

वित्त मंत्री भाषण पढ़ता रहता है, बीच बीच में विपक्ष विरोध भी करता रहता है। इससे एक जागरूक विपक्ष की उपस्थिति का एहसास होता रहता है। लेकिन यहां तो विपक्ष पूरी तरह से नदारद ही रहा। आप सोचिए, इसका क्या संदेश जाएगा? क्या लोग ऐसा करने के लिए कांग्रेसियों की पीठ थपथपाएंगे? क्या जनता को यह नहीं लगेगा कि जिन्हें हमने चुन कर विधानसभा में भेजा, वे वहां जाकर क्या कर रहे हैं? यह जानना उनका अधिकार है कि उनके नुमाइंदों ने सरकार को उनके गलत कदमों पर टोका या नहीं? जब वे लाइव प्रसारण पर अपने नुमाइंदों को सदन से ही नदारद देखेंगे तो वे क्या सोचेंगे? कांग्रेसियों को कुछ तो सोचना चाहिए। वे तो अभी से हतोत्साह की सारी सीमाएं पार कर चुके हैं।





