कविता का श्रृंगार है ‘छंद’       

  डॉ अरविन्द तिवारी
छन्द शब्द मूल रूप से छन्दस् अथवा छन्दः है। छंद का अर्थ है बांधना। किसी उक्ति को जब किसी विशेष लय, मात्रा या वर्ण योजना में बांधा जाता है, तो उसे छंद कहते है। छंद स्वयं बंधे रहते है, पर ये रस तथा भाव प्रकट करने एवं उसे एक हृदय से दूसरे हृदय तक पहुंचाने में बड़े सहायक होते है। लय और ताल से युक्त ध्वनि मनुष्य के हृदय पर प्रभाव डाल कर उसे आनंदित करती है। छंद का दूसरा नाम वृत्त है। वृत्त का अर्थ है प्रभावशाली रचना। सहज रूप से छंद ऐसा चौखटा है, जिसमें मात्राओं एवं अक्षरों के क्रम, यति, गति के नियम समाहित होते है। इसीलिए काव्य में छंदों को विशेष महत्व दिया जाता है।

छंद के तत्व
स्वर – स्वर की गणना से छंदों का स्वरूप निश्चित होता है।
यति – जिस स्थान पर जिह्वा स्वेच्छा से रुकती है, उसे यति अर्थात विराम कहते हैं।
गति – गति का अर्थ है प्रवाह। पद या श्लोक को किसी निश्चित प्रवाह में पढ़ना ही गति है।
वर्ण
एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते है, चाहे वह स्वर ह्रस्व हो या दीर्घ। जिस ध्वनि में स्वर नहीं हो उसे वर्ण नहीं माना जाता। वर्ण को ही अक्षर कहते हैं। वर्ण दो प्रकार के होते हैं –
ह्रस्व वर्ण – अ, इ, उ, ऋ, से बने क, कि, कु, कृ
दीर्घ वर्ण –  आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ से बने का, की, कू, के, कै, को, कौ
मात्रा
किसी वर्ण या ध्वनि के उच्चारण-काल को मात्रा कहते हैं। ह्रस्व वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है, उसे एक मात्रा तथा दीर्घ वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे दो मात्रा माना जाता है। इस प्रकार मात्रा दो प्रकार के होते हैं –
ह्रस्व- अ, इ, उ, ऋ
दीर्घ- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
छंद के प्रकार
छंद मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं –
मात्रिक छंद : जिन छंदों में मात्राओं की संख्या निश्चित होती है, उन्हें मात्रिक छंद कहा जाता है। जैसे – दोहा, रोला, सोरठा, चौपाई।
वर्णिक छंद : वर्णों की गणना पर आधारित छंद वार्णिक छंद कहलाते हैं। जैसे – घनाक्षरी, शार्दूलविक्रीडितम, दण्डक। वर्णिक छंदों में वर्णों के क्रम लघु – गुरु अर्थात ह्रस्व दीर्घ का नाम गण अर्थात समूह को दिया जाता है। एक गण में निश्चित लघु-गुरु क्रम से तीन वर्ण होते है। वर्णिक छंद में कुल आठ गण होते है, जिसमें (।) लघु का और ( ऽ ) गुरु का चिन्ह है।
उभय छंद : जिन छंदों में मात्रा एवं वर्ण दोनों की समानता एक साथ पाई जाती है उसे उभय छंद कहते हैं।
मुक्तक छंद : इन छन्दों को स्वच्छंद छंद भी कहा जाता है । इसमें मात्रा और वर्ण की संख्या निश्चित नही होती है।
गणना की रीति
गण                    चिह्न                             उदाहरण
भगण                   ऽ।।                                आनन
जगण                  ।ऽ।                                 मिलाप
सगण                   ।।ऽ                                कमला
यगण                   ।ऽऽ                                सुजाता
रगण                    ऽ।ऽ                                पालना
तगण                   ऽऽ।                                आकाश
मगण                   ऽऽऽ                               आजादी
नगण                   ।।।                                कनक
 
काव्य में छंद का महत्व
छंद से हृदय को सौंदर्यबोध होता है, जो मानवीय भावनाओं को झंकृत करते हैं। छंद में स्थायित्व होता है। सरस होने के कारण ये मन को भाते हैं। रीतिबद्ध होने के कारण छंद सुगमतापूर्वक कण्ठस्त हो जाते हैं।
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