ऐसा न हो कि सफाई के चक्‍कर में बीमारियों का रास्‍ता खोल दें हम : सेहत सुझाव-4

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कोरोना संक्रमण काल से गुजरने के दौरान इससे सबक लेते हुए हमें आगे के जीवन में क्‍या-क्‍या सावधानियां बरतनी होंगी, अपनी जीवन शैली में क्‍या सुधार लाना होगा, इसे लेकर ‘सेहत टाइम्‍स‘ ने सेहत सुझाव देने की अपील करते हुए अपने प्रिय पाठकों से सुझाव मांगे थे। हमें खुशी है इस पर हमें सम्‍मानित पाठकों के विचार और सुझाव मिल रहे हैं, इसके लिए ‘सेहत टाइम्‍स‘ पाठकों का धन्‍यवाद अदा करता है।

अंकुर श्रीवास्तव

आजकल स्वच्छता शब्द रोजमर्रा का मूलमंत्र बन गया है, और जबसे कोरोना वायरस की महामारी पूरे विश्व में फैली है तबसे तो ज़िन्दगी ही इस शब्द के आसपास घूम रही है। उद्योग जगत ने भी इसे एक स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा है और टीवी पर आने वाले विज्ञापनों से लेकर हमारे आपके पड़ोस की किराना दुकानों तक विविध प्रकार के सफाई के उत्पादों से पटे पड़े हैं, और पिछले कुछ हफ़्तों से कोरोना वायरस का जिस प्रकार हमारे दिलोदिमाग पर आतंक फैला है, उसके प्रभाव में आकर जिससे जो संभव हो सकता है वो उसे करने में जुटा हुआ है। जब इस महामारी का ज्वार उतरेगा, उसके बाद की जीवनशैली में ऐसी कई नयी आदतें और नए परहेज़ शामिल होने वाले हैं जिनकी अब तक हम कल्पना भी नहीं करते थे। विख्यात अर्थशास्त्री और रिज़र्व बैंक के भूतपूर्व गवर्नर डॉ. रघुराम राजन का कहना है कि हमें शायद कोरोना के साथ रहने के लिए खुद को तैयार करना पड़ेगा।

सफाई उत्‍पादों का विश्‍लेषण जरूरी

खुद को और अपने परिवार को इस महामारी से बचाने के लिए हम सभी ने अपने जीवन में अनेक बदलाव किये हैं। मास्क, सेनेटाइजर, दस्ताने जिन्हें हम यदाकदा ही इस्तेमाल करते थे, उनके बिना आने वाली ज़िंदगी की कल्पना ही बहुत दूर दिखाई देती है। दोस्तों और करीबियों से गर्मजोशी से गले मिलना तो दूर, अब तो हाथ मिलाना भी कठिन हो चला है। चाट के ठेलों और छोले-भठूरे की दुकानों के इर्दगिर्द बीतने वाली शामें आजकल मोबाइल एप्स पर फ्लोर क्लीनर और वेजटेबल वॉश खरीदने में बीतने लगी है। स्वयं को स्वस्थ रखने की दौड़ में हम सभी टीवी के विज्ञापनों,  व्हाट्स एप्प के संदेशों और खुद की समझ-बूझ से हर संभव उपाय कर रहे हैं। इनमें से ज़्यादातर सफाई और स्वच्छता के उत्पाद हमारे मानकों पर खरे उतर रहे हैं और हमें अनेकों सूक्ष्म जीवों से पनपने वाली बीमारियों से बचाते हैं। लेकिन इन प्रभावशाली उत्पादों का एक और आयाम भी है जिस पर विश्लेषण करना और उनके बारे में पूरी जानकारी रखना आवश्यक है।

नये रसायनों को सावधानी से दें अपनी जीवन शैली में स्‍थान

बाज़ार में उपलब्ध शायद कोई ही ऐसा उत्पाद हो जिसके कुछ दुष्प्रभाव न हो। बाज़ार की कड़ी प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ताओं तक पहुंचने की दौड़ में सभी उत्पादकों को न केवल आकर्षक पैकिंग और विज्ञापनों का सहारा लेना पड़ता है, बल्कि अनेक प्रकार के ऐसे उपाय (जैसे सुगंध, रंगआदि ) भी करने पड़ते हैं जिससे वो अपनी एक अलग पहचान बना सकें। इनमें से अनेक उत्पादों का हमारे जीवन में एक स्थान बन चुका है जो शायद आने वाले लम्बे समय तक कम नहीं हो सकता, लेकिन इनमें प्रयोग होने वाले रसायनों का लम्बे समय में हमारे स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा, इस पर बहुत ही कम शोध हुआ है। जिस प्रकार मोबाइल उपकरणों के विकिरण से होने वाले दुष्प्रभाव का पता चलने, और विकिरण से जुड़े मानक बनने तक हममें से अनेक लोग कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के शिकार हो गए, उसी प्रकार हमें बहुत ही सावधानी से और उचित मात्रा में ही इन नए रसायनों को अपनी जीवनशैली में स्थान देना है।

इस्‍तेमाल कर रहे हैं, परिणाम क्‍या होंगे यह नहीं पता

निःसंदेह ये नए नए उत्पाद हमारे जीवन को बहुत आरामप्रद बनाते हैं, और बाज़ार की प्रतिस्पर्धा के कारण बहुत ही वाजिब मूल्यों पर आसानी से उपलब्ध हैं। जैसे मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियों, मैट्स, क्रीम और इलेक्ट्रॉनिक वेपराइज़र्स ने मच्छरदानियों को कितने ही घरों से निकाल फेंका है, लेकिन शायद हम कभी भी इसमें प्रयोग होने वाले विषैले रसायनों के बारे में ध्यान देते हैं। यही रसायन, जैसे पलेथरिन, साईपर्मेथ्रिन, डाईएथेलबेन्ज़ामाइड ज्यादा सांद्रता में कृषि के लिए कीटनाशकों का काम करते हैं, जिनके उपयोग के लिए अनेक सावधानियां बरतनी पड़ती हैं। लेकिन जब यही रसायन हमारे रोजमर्रा का ही हिस्सा बन बैठे हैं, तो सालोंसाल तक इन रसायनों का संसर्ग हमारे ऊपर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में हम सभी ऐसे ही रेडीमेड उपाय करके निश्चिन्त हो जाते हैं, लेकिन ये भूल बैठते हैं कि इनकी सहूलियत से ज्यादा हम अपने परिवार को खतरनाक बीमारियों की ओर ले जा रहे हैं। इसी प्रकार की सुविधाओं के कारण डिब्बाबंद दुग्ध उत्पाद और फलों का रस हम सभी स्वास्थवर्धन के ध्येय से लगभग रोज़ ही इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इनमें प्रयोग होने वाले फ्लेवर्स, परिरक्षक (प्रेज़रवेटिव) और शर्करा का हमारे पाचनतंत्र पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, उसके बारे में बहुत ही कम शोध हुआ है। चूँकि इस प्रकार से रसायनों का प्रयोग पिछले कुछ दशकों से ही शुरू हुआ है, लम्बी अवधि में ये शरीर पर क्या प्रतिकूल असर डाल रहे हैं, इस पर भी शोध जगत और उद्योग जगत में काफी मत-मतान्तर है।

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देखादेखी इस्‍तेमाल करने की होड़ से बचने की जरूरत

इसी प्रकार कई ऐसे उत्पाद हैं, जो हम सिर्फ दूसरों को देखकर, विज्ञापनों से प्रेरित होकर खरीद लेते हैं, लेकिन हम अगर एक मिनट भी सोचें कि क्या हमें वास्तव में इनकी आवश्यकता है या नहीं, और इनका हमारे ऊपर क्या असर हो सकता है तो शायद हम इन उत्पादों को दूर से ही नमस्कार कर लेंगे। अभी विगत कुछ सालों से ओज़ोन जनरेटर का चलन गति पकड़ रहा है, और ओज़ोन परत के क्षय से जुड़ी वैश्विक आपदा के प्रभाव में आकर हम ये सोच बैठते हैं कि ओज़ोन जनरेटर बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक उपकरण है, लेकिन थोड़ी सी भी असावधानी बहुत ही नुकसानदेह हो सकती है। ओज़ोन गैस हमारे श्वसन तंत्र को बुरी तरह हानि पहुंचा सकती है। इसी प्रकार एक से बढ़कर एक दावा करने वाले फिनायल, फ्लोर क्लीनर्स, ग्लास क्लीनर्स, वेजिटेबल वॉश, सेनेटाइज़र्स भी ऐसे रसायनों से भरे हुए हैं जिनका लम्बे समय तक उपयोग करने से ऐसी खतरनाक बीमारियां हो सकती है जिनका इलाज संभव नहीं है। क्या आपने कभी विचार किया है कि अगर इनमें से कुछ उत्पादों का इस्तेमाल न भी हो तो भी एक स्वच्छ और स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है बल्कि इनमें पाये जाने वाले यौगिक जैसे आइसो प्रोपाइल एलकोहॉल और बेन्ज़िलकोनियम क्लोराइड के संपर्क में आकर फर्श पर खेलते हुए बच्चों को अनेक समस्याएं हो सकती हैं। संभवतः आजकल जिस प्रकार कैंसर अनेक स्वस्थ लोगों पर आक्रमण कर रहा है, उसका एक कारण अनेक नए रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग भी हो सकता है। इनमें से कई ऐसे उत्पाद हैं जिनकी कदाचित हमें कोई आवश्यकता ही नहीं हैं, लेकिन बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रभावशाली विज्ञापनों के बहाव में आकर हम अपनी जेब और अपनी सेहत, दोनों ही पर बुरा असर डाल रहे हैं।

अत्‍यधिक एहतियात भी करता है प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर

चिकित्सा जगत में अनेक विशेषज्ञों का मत है कि एक सीमा के बाद अत्यधिक एहतियात भी हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमज़ोर कर सकता है, लेकिन यह सीमा कहाँ पर तय होनी चाहिए, इसके बारे में कोई सीधा फॉर्मूला नहीं है। यह हमें अपनी बुद्धि और विवेक से स्वयं तय करना पड़ेगा कि स्वच्छता की अंधी दौड़ में हम कहीं खुद को ज्यादा नाज़ुक न बना बैठें, और जिस प्रकार एक के बाद एक नयी बीमारी और महामारी से हम दो चार हो रहे हैं, अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता खो बैठना एक नए संकट का कारण बन सकता है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने पहले से ही एंटीबायोटिक प्रतिरोध (रेसिस्टेंट) आपदा को वैश्विक स्वास्थ्य , खाद्य सुरक्षा और विकास के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण संकट के रूप में घोषित किया हुआ है। इन परिस्थितियों में अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना और खुद को सूक्ष्मजीवों से बचाना दोनों ही आवश्यक है।

उत्‍पादों पर थोड़ा सा अध्‍ययन जरूर करें

ऐसे में विज्ञापनों, प्रचलन, उपभोक्तावाद और महामारी की घबराहट के प्रभाव में आकर खुद को और भी भयावह परिस्थितियों से दूर रखें। हो सके तो अपनी वर्तमान जीवनशैली में इस्तेमाल होने वाले सभी रासायनिक उत्पादों पर थोड़ा अध्ययन करें और उनमें प्रयोग होने वाले रसायनों से हो सकने वाले दुष्प्रभावों को जानने की कोशिश करें। पैकेट पर दी हुई जानकारी का पूरा इस्तेमाल करें और यदि आपके घर में बच्चें,  बुज़ुर्ग या गर्भवती महिलाएं हों तो और भी ज़्यादा सतर्कता रखें। इंटरनेट पर किसी भी रसायन के बारे में प्रमाणित मूलभूत जानकारी और उनके दुष्प्रभाव बहुत ही सुलभ हैं। इसके अलावा किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेकर इन सुविधाजनक और उपयोगी उत्पादों का सही तरह से और सही मात्रा में इस्तेमाल करें। स्वच्छता उत्पादों के इस दूसरे पहलू को भी गहराई से समझें और आने वाले समय के लिए खुद को तैयार रखें।

-अंकुर श्रीवास्तव, केमिकल इंजीनियर, प्रयागराज, उत्‍तर प्रदेश (भारत)

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