एसजीपीजीआई रेजीडेंट प्रकरण में पीड़ि‍त डॉक्‍टर को व्‍यापक समर्थन

-इंडियन मेडिकल एसोसिएशन व रेजीडेंट डॉक्‍टरों की राष्‍ट्रीय संस्‍था फोरडा का समर्थन

-आवश्‍यक हुआ तो न्‍याय दिलाने के लिए हाईकोर्ट के वकीलों ने भी रखा मदद का प्रस्‍ताव

-भूखे रहकर सत्‍याग्रह कर रहे डॉ मनमोहन को हुईं कई उल्टियां, हालत स्थिर

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सत्याग्रह कर रहे डॉ मनमोहन सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई के एक जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर द्वारा एम डी अंतिम वर्ष की परीक्षा की थ्‍योरी में फेल किए जाने के आरोप की गूंज दूर तक पहुंची है। जहां एक और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इस प्रकरण पर रेजीडेंट डॉक्‍टर के साथ हुए अन्‍याय को अपना समर्थन देते हुए रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) को पूर्ण समर्थन दिया है वही रेजिडेंट डॉक्टर्स की राष्ट्रीय संस्था फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (FORDA) ने भी इस मामले में अपना पूर्ण समर्थन देते हुए मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का विश्वास दिलाया है। यही नहीं रेजीडेंट डॉक्टर की लड़ाई को समर्थन की कड़ी में हाईकोर्ट के कई वकीलों ने भी न्याय न मिलने की स्थिति में पूर्ण न्याय सहायता उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया है।

दूसरी ओर पीड़ित रेजिडेंट डॉ मनमोहन सिंह का भूखे रहकर सत्याग्रह आज दूसरे दिन भी जारी रहा। एसोसिएशन के अनुसार उनकी हालत कल से बिगड़ी जरूर है, किंतु अभी स्थिर है आज दिन भर में उन्हें कई बार उल्टी भी हुई। एसोसिएशन ने डॉ मनमोहन सिंह के समर्थन में आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है इसके तहत आरडीए ने आज ई-धरने का आयोजन किया तथा आगे की रणनीति तय की। एसोसिएशन के सभी पदाधिकारियों ने डॉ मनमोहन सिंह के साथ हुए अन्याय की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हुए मामले में गंभीरता से त्वरित कार्यवाही की मांग की। ई-धरने के माध्यम से सभी रेजिडेंट डॉक्टर्स ने अपनी मांगें स्पष्ट कीं।

उनका कहना था उनकी ओर से जो मांग रखी गई हैं उनमें पहली है लिखित परीक्षा की कॉपी तुरंत सील बंद कर निदेशक के संरक्षण में जमा कराई जाए। इसके अलावा डॉ मनमोहन सिंह की कॉपी की प्रति उन्हें उपलब्ध कराई जाए तथा एक निष्पक्ष समिति इस मामले की जांच करे। इसके अतिरिक्त ई-धरने में इस बात को उठाया गया कि ऐसी घटनाएं पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं और कुछ बड़े सवाल खड़े करती हैं। एसोसिएशन द्वारा जो सवाल उठाए गए हैं उनमें है कि

क्या इस तरह देश के सर्वश्रेष्ठ छात्रों का अनुत्तीर्ण होना संस्थान और संस्थान द्वारा प्रदान किए जा रहे प्रशिक्षण की प्रणाली पर प्रश्न नहीं खड़े करता है।क्या नुकसान होने की स्थिति में किसी भी तरह की अपील का तंत्र मौजूद ना होना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है।इसी प्रकार देश में जब डॉक्‍टर्स की इतनी कमी है तब सिर्फ आत्‍म संतुष्टि के लिए डॉक्टरों को अनुत्तीर्ण कर बैठा दिया जाना राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में नहीं आता है।ई-धरने के दौरान यह भी मांग की गयी कि यह सूचना भी उपलब्ध कराएं

पिछले 3 साल में किस विभाग में कितने रेजिडेंट अनुत्तीर्ण हुए, इनमें से कितनों को छह महीने बाद उत्तीर्ण कर दिया गया ?

संस्थान में होने वाली अकादमिक गतिविधियों में कुल कितने प्रतिशत लेक्चर संकाय सदस्‍यों द्वारा लिए गए ?

क्‍या डॉ मनमोहन के प्रदर्शन की समीक्षा हर छह माह में होने वाले आंतरिक मूल्यांकन के बाद की गई ? यदि प्रदर्शन ठीक नहीं था तो उसे सुधारने के लिए विभाग द्वारा क्या प्रयास किए गए?

ई-धरने के दौरान अनुत्तीर्ण हुए छात्रों के साथ किए जाने वाले असंवेदनशील व्यवहार पर भी रेजिडेंट में काफी रोष दिखा जिसमें कि प्रैक्टिकल एग्जाम की सुबह ही थ्योरी का रिजल्ट बताये जाने वाली मानसिक प्रताड़ना तथा अनुत्तीर्ण छात्रों को संस्थान में रहने के लिए दिये जाने वाले कमरे के 15000 से 18000 रुपये तक वसूले जाना शामिल है।

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